PDF हिन्दी साहित्य का इतिहास: PDF नोट्स
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Summary
यह दस्तावेज़ हिन्दी साहित्य के इतिहास पर एक झलक प्रदान करता है, जिसमें साहित्य की विभिन्न शैलियों को शामिल किया गया है। इसमें पाठ का प्रारूप, पाठ का उद्देश्य, प्रस्तावना, और अपभ्रंश के संदर्भ की जानकारी है। यह दस्तावेज़ मुख्य रूप से उन छात्रों के लिए है जो साहित्य का अध्ययन करना चाहते हैं।
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हिषय हहन्दी प्रश्नपत्र सं. एिं शीषषक P1 : हहन्दी साहहत्य का आहतहास आकाइ सं. एिं शीषषक M1 : हहन्दी साहहत्य की पृष्ठभूहम आकाइ टैग HND_P1_M1 प्रधान हनरीक्षक प्रो. रामबक्ष जाट प्रश्नप...
हिषय हहन्दी प्रश्नपत्र सं. एिं शीषषक P1 : हहन्दी साहहत्य का आहतहास आकाइ सं. एिं शीषषक M1 : हहन्दी साहहत्य की पृष्ठभूहम आकाइ टैग HND_P1_M1 प्रधान हनरीक्षक प्रो. रामबक्ष जाट प्रश्नपत्र-संयोजक डॉ. हममता चतुिद े ी आकाइ-लेखक डॉ. ऄचषना िमाष आकाइ-समीक्षक प्रो. हररमोहन शमाष भाषा-सम्पादक प्रो. देिशंकर निीन पाठ का प्रारूप 1. पाठ का ईद्देश्य 2. प्रमतािना 3. मध्यदेश : हहन्दीभाषी भूभाग 4. श्रमण-परम्परा तथा ब्रह्म-हचन्तन-परम्परा 5. संमकृ त साहहत्य 6. मध्य देश की भाषा का हिकास और रूपान्तर 7. ऄपभ्रंश : पुरानी हहन्दी 8. ऄपभ्रंश और अभीर-जन 9. ऄपभ्रंश का साहहत्य 10. जैन ग्रन्थ 11. आतर स्रोतं से प्राप्त ऄपभ्रंश रचनाएँ 12. ऄपभ्रंश काव्य के रूपबन्ध 13. हनष्कषष HND : हहन्दी P1 : हहन्दी साहहत्य का आहतहास M1 : हहन्दी साहहत्य की पृष्ठभूहम 1. पाठ का ईद्देश्य आस पाठ के ऄध्ययन के ईपरान्त अप – हहन्दी भाषा के ितषमान मिरूप ग्रहण के बारे मं जान पाएँगे। हहन्दी भाषा की हिकास यात्रा मं ऄन्य भाषाओं का योगदान समझ पाएँगे। हहन्दी साहहत्य की हनर्ममहत मं हहन्दी से पूिष के साहहत्य की भूहमका से पररहचत हो सकं गे। 2. प्रमतािना हहन्दी भाषा और साहहत्य के हनमाषण की शुरुअत के लगभग साथ-साथ ‘भारतिषष के ईत्तर-पहश्चम सीमान्त से हिजयदृप्त आमलाम का प्रिेश हुअ।’ लगभग यही िह समय भी है, जब हहन्दी साहहत्य जगत मं भाषा, हिचार, दशषन अदद क्षेत्रं मं एक हलचल और पररितषन दृहिगोचर हुअ। ‘साहहत्य’ शामत्र और पाहडडत्य से थककर लोक की ओर ईन्मुख हुअ। महत् परम्पराएँ लोकग्राह्य होने के ईपक्रम मं छनकर लोकभाषा मं समा रही थं और आस क्रम मं कहं छू ट रही थं तो कहं ऄपना रूप बदल रही थं। लघु परम्पराएँ साहहत्य रचना के माध्यम से प्रहतहष्ठत और मथाहपत हो रही थं। बौद्ध, जैन और ब्राह्म हिचार और दशषन, संमकृ त, पाहल, प्राकृ त और ऄपभ्रंश भाषाओं से छन कर यहाँ पुरानी हहन्दी मं ऄहभव्यक्त हो रहे थे और देशकाल के सन्दभष मं हिकहसत और रूपान्तररत भी। महत्परम्परा का सम्बन्ध समाज के सुहशहक्षत, मननशील, हचन्तनपरायण, हिहशि जन के साथ होता है, ऄथाषत ईस िगष के साथ, जो सांमकृ हतक ज्ञानराहश के हिश्लेषण, व्याख्या, हचन्तन और सजषन मं समथष होते हं। महत्परम्परा की कोरट मं िह हिपुल ज्ञानराहश रखी जाती है जो दकसी समाज मं मागषदशषन देने िाले दीपक की भूहमका हनभाती है। लघु परम्परा भी महत्परम्परा से ही जुड़ी होती है और ईसे लोकहिश्िासं, संमथाओं, लोककथाओं, कहाितं, पहेहलयं, दकमसं, हमथकं अदद रूपं मं ऄहभव्यक्त करके लोकसाहहत्य की राहश का सजषन करती है। आस दृहि से हहन्दी साहहत्य को अददकाल से ही एक प्रौढ़ और पुि लोक-साहहत्य की तरह देखा जा सकता है, जो हशि साहहत्य की प्रहतष्ठा पाने के रामते पर है। हजस कालखडड को हहन्दी साहहत्य का अददकाल या अरम्भ कहा जाता है, िह देश के आहतहास मं मध्यकाल के बीचोबीच का समय है। आसके पीछे हचन्तन और सजषन की हजार िषष की ऐहतहाहसक पीरठका मौजूद है, लेदकन दिर भी हहन्दी साहहत्य का यह “अददकाल” है, क्ययंदक हजसे हम अज हहन्दी भाषा के नाम से जानते हं, िह ईसके अरहम्भक मिरूप की, तत्कालीन लोकभाषा की साहहहत्यक मिीकृ हत और प्रहतष्ठा का अददकाल है। 3. मध्यदेश : हहन्दीभाषी भूभाग अज के भारत मं राजमथान, हररयाणा, ईत्तर-प्रदेश, मध्यप्रदेश और हबहार हहन्दीभाषी राज्य हं। यह एक हिशाल भूभाग है। राजमथान और पंजाब की पहश्चमी सीमा से लेकर ईत्तर-प्रदेश के ईत्तरी सीमान्त, मध्य प्रदेश और हबहार के पूिी सीमान्त तक िै ले हुए तथा प्राचीनकाल से ‘मध्यदेश’ के नाम से प्रहसद्ध आस समूचे प्रदेश की साहहहत्यक भाषा को हहन्दी कहा जाता रहा है। हहन्दी साहहत्य की भूहमका मं अचायष हजारीप्रसाद हििेदी ने मध्यदेश के सांमकृ हतक मिभाि की चचाष करते हुए बताया है दक िह चौमुखी संमकृ हतयं और हिहभन्न प्रकृ हतयं से हघरा हुअ भी रक्षणशील और पहित्रताहभमानी होता है। हिहभन्न संमकृ हतयं की रगड़ से ईसमं िैचाररक गहतशीलता और दूसरे धमं, मतं, सम्प्रदायं, संमकृ हतयं के हलए HND : हहन्दी P1 : हहन्दी साहहत्य का आहतहास M1 : हहन्दी साहहत्य की पृष्ठभूहम सहनशीलता ददखाइ देती है, दकन्तु अचार-व्यिहार मं रक्षणशीलता बनी रहती है। आसी मध्यदेश के मध्यकाल मं हहन्दी साहहत्य का अददकाल – संित् 1050 से 1375 तक की सिा तीन सौ िषं की ऄिहध-घरटत हुअ। आस घटना का हिशेष पक्ष आमलाम का भारत-अगमन है। आन दोनं घटनाओं की समकालीनता का यह पररणाम मिाभाहिक ही था दक हहन्दी साहहत्य के प्रकट पररितषनं को आमलाम के अगमन का प्रभाि, पररणाम या प्रहतदक्रया मानकर व्याख्याहयत दकया जाए। अचायष रामचन्र शुक्यल ने पररहमथहतयं पर ध्यान ददया और हहन्दी साहहत्य के अगामी हिकास को आमलाम के अगमन की सन्दभष -सापेक्षता मं देखा। अचायष हजारीप्रसाद हििेदी ने देखा दक मध्यकालीन हहन्दी साहहत्य तक का हर ऄंग भाषान्तरं से गुजरता हुअ परम्परा मं पहले से मौजूद रहा है। ईन्हंने परम्परा को रे खांदकत दकया; टू टी हुइ कहड़यं को जोड़ा, खाली जगहं को शोधसम्मत तथ्ययं से भरा, ईसमं अते हुए मोड़ मं हनहहत सूत्रं के सुलझाि-ईलझाि की व्याख्या की, आमलाम के प्रभाि, पररणाम और प्रहतदक्रया िाले तकं का ईत्तर ददया, ईसे भारतीय हचन्ता के मिाभाहिक हिकास’ की तरह देखा और घोहषत दकया दक आमलाम ऄगर न भी अया होता तो हहन्दी साहहत्य का बारह अना िैसा ही होता जैसा िह अज है। हहन्दी साहहत्य की पृष्ठभूहम के ऄध्ययन के दो पक्ष हो सकते हं। एक तो ईसकी तात्काहलक पृष्ठभूहम, हजसके ऄन्तगषत ईन समसामहयक प्रभािं और दबािं का हििेचन दकया जाता है, हजनके भीतर रहते हुए साहहत्य की रचना होती है। दूसरे , पीछे से चली अती िे पूि-ष परम्पराएँ, हजन्हंने जातीय मानहसकता का हनमाषण दकया। जातीय मानहसकता साहहत्य को रचती है और ईसमं ऄहभव्यक्त भी होती है। िह मियं रचना सामग्री भी है और ईसकी ईत्पादक भी। तात्काहलक पररहमथहतयं की प्रहतदक्रया मं जातीय मानहसकता की ऄहभव्यहक्त का सार-तत्त्ि मात्र तात्काहलक नहं होता। आस सन्दभष मं पृष्ठभूहम के ऄध्ययन का ऄथष आमलाम के भारत-प्रिेश के पहले से चली अती परम्परा के ईन घटकं का ऄध्ययन है, जो ‘भारतीय हचन्ता का मिाभाहिक हिकास’ कहे जा सकते हं। 4. श्रमण-परम्परा तथा ब्रह्म-हचन्तन-परम्परा प्राचीन बौद्ध तथा जैन धमषग्रन्थं से श्रमण परम्पराओं तथा सम्प्रदायं का अगमन हुअ। ईसके ऄन्तगषत हिरहक्तप्रधान बौद्ध और जैन परम्पराएँ और ईनका करुणापुि धमष अता है। िे मूलतः हनरीश्िरिादी परम्पराएँ रही हं और िैददक कमषकाडड और बहल-परम्परा के हिरुद्ध हिचारधाराएँ हं। ब्राह्मण परम्परा का अगमन िेद, ईपहनषद और ममृहतयं से हुअ है। ब्राह्मण-धमष ब्रह्म को मोक्ष का अधार और िेद िाक्यय को ब्रह्म-िाक्यय मानता है। ब्राह्मण के ऄनुसार ब्रह्म और ब्रह्माडड को जान कर ही ब्रह्मलीन होने का मागष खुलता है। श्रमण-परम्परा के प्रबल होने पर ब्राह्मण धमष दब गया था। सातिं-अठिं शताब्दी मं शंकराचायष के ऄिैत मत की मथापना के साथ ब्राह्मण-धमष का पुनरुज्जीिन हुअ। हहन्दी साहहत्य का आहतहास आन दोनं जीिनदृहियं के ईलझने- सुलझने-समहन्ित होते रहने का आहतहास है। इसा की सातिं शताब्दी तक बौद्ध धमष प्रबल रूप से मथाहपत था। लोक-सम्पकष से िह दो सम्प्रदायं मं बँट गया था - हीनयान और महायान। हीनयान संन्यासी और हिरक्त हभक्षुओं का सम्प्रदाय बना रहा और महायान जन-साधारण के साथ गहन रूप से सम्पृक्त होकर ऄनेक शाखाओं प्रशाखाओं मं िै लता चला गया। ऄन्त की तरफ़ ईसमं सहजयान और िज्रयान का ईद्भि हुअ। महायान ने ऄपनी सापेक्षता मं हीनयान हिशेषण का यूँ प्रचार दकया दक िह संज्ञा बन गया और मियं हीनयान ने भी ईसे ऄपने नाम की तरह ऄपना हलया। HND : हहन्दी P1 : हहन्दी साहहत्य का आहतहास M1 : हहन्दी साहहत्य की पृष्ठभूहम अचार-हिचार की सहजता और दकसी भी दकमम की कट्टरता का ऄभाि महायान शाखा की व्यापक सत्ता मं सहायक हुअ। मौयष सम्राट ऄशोक के प्रयत्नं से बौद्ध धमष का प्रचार-प्रसार इ.पू. िषं मं ही अरम्भ हो चुका था। इसिी सन् के अरम्भ मं िह सुदरू पूिष और मध्य एहशया से जुड़ चुका था और नइ बातं के अगमन से ईसके पुराने रूप मं पररितषन होने लगा था। बौद्ध साधना के साथ शैि और शाक्त ईपासनाओं के योग से सहजयान और िज्रयान तन्त्रसाधना के रूप मं हिकहसत होने लगे थे। अचायष हजारीप्रसाद हििेदी ने संकेत दकया है दक ताहन्त्रकं का ‘अगम’ शब्द बाहर से अए हुए ‘अचार’ का ऄथष देता है। परिती शामत्र-हनरपेक्ष सन्त-साहहत्य पर नामजप और बौद्ध तत्त्ििाद के हनशान ददखाइ देते हं। ऄितारिाद की शामत्र- सापेक्ष भािधारा के भक्तं पर भी महायान का प्रभाि पड़ा। परमपर हिरुद्ध हिश्िासं और हिचारं का ऐसा समन्िय भारतीय लोकधमष की ऄपनी हिहशिता है। अचायष हििेदी के शब्दं मं ‘भारतीय गृहमथ अज भी परमपर हिरोधी मतं को मानने िाले साधुओं की और हभन्न-हभन्न सम्प्रदायं के हभन्न हभन्न प्रकृ हत के देिताओं की पूजा करता है।’ हिहभन्न प्रभािं, दबािं और समन्ियं मं पड़कर बदलते हुए बौद्ध-धमष का हचह्न ईस समय के ऄपभ्रंश/पुरानी हहन्दी के साहहत्य मं प्राप्त होता है। ईस समय का मतलब िही समय, जब शामत्र का लोक मं रूपान्तर हो रहा था और शामत्र के उपर लोक की प्रहतष्ठा हुइ। मध्यदेश के सांमकृ हतक मिभाि के ऄनुकूल अचार-व्यिहार की रक्षणशीलता के चलते बौद्ध मठं के ईठ जाने के बाद भी पूजा-साधना की हिहधयाँ शेष रहं, लेदकन ईनमं ‘पाहडडत्य और कृ च्छसाध्यता ि किपूणष साधना का कोइ लेश नहं रहा।’ महायान ऄपने अचार-व्यिहार की सहजता मं लोकमत की प्रधानता से शुरू और ईसी मं घुलकर लुप्त हो गया। यह ईसकी मिाभाहिक पररणहत थी। हजन ददनं महायान लोकधमष रूप लेता हुअ साधारण जनजीिन मं ऄपनी पैठ बना रहा था, ईन ददनं ब्राह्मण धमष लोक- साधारण से ईत्तरोत्तर ऄलग होता जा रहा था। छठी-सातिं शताब्दी तक हालत यह हो चुकी थी दक संमकृ त के हिशाल भडडार मं से िेदोपहनषद् अदद एकाध ग्रन्थ ही अत्मोपलब्ध ज्ञान और प्रत्यक्ष जीिन के हबचौहलये रह गए थे। सातिं- अठिं शताब्दी मं पुनरुज्जीहित ब्राह्मण-धमष शंकराचायष की मथापनाओं और व्याख्याओं िारा ऄपना हपछला रूप बहुत कु छ बदल चुका था। बौद्ध-धमष की ‘शून्य’ की संकल्पना ईसमं शाहमल हो चुकी थी। आस समन्िय के पररणाममिरूप शंकर को प्रच्छन्न बौद्ध भी कहा गया था। महायान के प्रभाि से धमषसम्मत लोकव्यिहार मं जो बातं शाहमल हुईं, ईनमं प्रमुख बात सिषभूत-हहतिाद, जीिोद्धार मं हिश्िास और ईसके हलए कि भोगने की प्रिृहत्त थी। यह मान्यता भी प्रबल हुइ दक मनुष्य ऄपने सत्कमष और भहक्त से बोहधसत्ि (लोकहिश्िास मं ‘मुक्त’) हो सकता है; बुद्धगण (लोकहिश्िास मं इश्िर काल और देश की सीमा मं पररव्याप्त भी हं और लोकोत्तर भी; भौहतक जगत नश्िर तथा सारशून्य है। कमषकाडड की बहुलता और तन्त्र-मन्त्र मं हिश्िास ईत्पन्न हुअ। बौद्ध-धमष के मूल ईपदेश पाहल मं थे, लेदकन आस समय तक पाहल की बजाय संमकृ त ग्रन्थ ऄहधक हिश्िसनीय हो ईठे थे। बुद्ध (लोकव्यिहार मं इश्िर मं हिश्िास ऄटू ट था और नामजप से हनिाषण का अश्िासन था। HND : हहन्दी P1 : हहन्दी साहहत्य का आहतहास M1 : हहन्दी साहहत्य की पृष्ठभूहम महायान सहज मानिीय, लोकगम्य और समन्ियमूलक था। ईसकी ये हिशेषताएँ हहन्दू धमष को ईसकी देन भी हो सकती हं और हहन्दू धमष के साथ समन्िय के पररणाममिरूप बौद्ध-श्रमण- परम्परा मं नया अयाम भी। हनहश्चत बात यही है दक समन्िय हो रहा था। 5. संमकृ त साहहत्य साहहत्य और हचन्तन पर महायान का प्रभाि िैचाररक ही था। अलोच्य प्रदेश और काल मं सामाहजक जीिन मं अचार- व्यिहार का मेरुदडड ममात्तष (ममृहत-सम्मत धमष हिचार ही बने रहे। कहने को संमकृ त इमिी सन् के बाद भी संमकृ त हचन्तन और सजषन का माध्यम तो बनी रही और सत्रहिं-ऄठारहिं सदी तक ईसमं लेखन भी चलता ही रहा, लेदकन ऄब लोकजीिन की भाषा िह नहं थी और ईसका साहहत्य भी पहडडतं के बीच का कायषकलाप बन गया था। संमकृ त की रचना परम्परा के मूल रामायण और महाभारत जैसे ग्रन्थं मं लोकजीिन के साथ सम्पृहक्त का जो गहन भाि था, िह जाता रहा था। अचायष हििेदी के शब्दं मं ऄब ‘आस साहहत्य मं लोक जीिन से हटे हुए एक कहल्पत जीिन और कहल्पत संसार का अभास हमलता है।’ अलोच्यकाल की ईल्लेखनीय संमकृ त रचनाओं मं सातिं शताब्दी मं हषष की रचना के रूप मं प्रहसद्ध नाटक नागानन्द हलखा गया, हजसके नान्दीपाठ मं बुद्ध की िन्दना है। ऄिधूत-गीता का ितषमान रूप पहडडतं के ऄनुसार निं-दसिं सदी का है। ग्यारहिं सदी के महत्त्िपूणष संमकृ त लेखन मं जयदेि कृ त गीतगोहिन्द, सोमदेि कृ त कथासररत्सागर और क्षेमन्े र कृ त बृहत्कथामंजरी का नाम है, जो इ.पू. पाँचिं सदी की पैशाची भाषा की बृहत्कथा का संमकृ त मं काव्यात्मक रूपान्तरण है। श्रीहषष का महाकाव्य नैषधचररत बारहिं सदी की रचना है। संमकृ त मं मौहलक रचना की बजाय टीका-लेखन की प्रिृहत्त शुरू हुइ। ऄपने ज्ञान को अषष-ज्ञान ऄथिा परम्परा-हसद्ध ज्ञान से घटकर मानने की प्रिृहत्त के कारण कइ बार मौहलक हचन्तन को भी टीका के माध्यम से ही प्रमतुत दकया गया। दसिं शताब्दी के महान दाशषहनक और अचायष ऄहभनिगुप्त ने ऄपना सममत मौहलक हचन्तन टीकाओं के माध्यम से ही प्रमतुत दकया है। ईन्हं मौहलक ग्रन्थ की तरह भी प्रमतुत दकया जा सकता था, लेदकन दकसी प्राचीन ग्रन्थ से जोड़कर ऄपनी बात रखने के पीछे यह मनोिृहत्त सदक्रय जान पड़ती है दक आस तरह ऄपनी बात को अषष और श्रुहतसम्मत हसद्ध दकया जा सके । आसी मनोिृहत्त के पररणाममिरूप प्रमथान-त्रयी ऄथाषत बादरायण का ब्रह्मसूत्र, ईपहनषद और गीता का सहारा लेकर ही हर िैष्णि अचायष ने ऄपनी बात कही दक आसके हबना ईनका मतिाद न तो प्रामाहणक माना जाएगा, न रटक ही सके गा। दसिं-ग्यारहिं शताब्दी तक पहुँचते पहुँचते प्रमथानत्रयी के ऄलािा भी सभी अचायं के ग्रन्थं को टीका का योग्य सुपात्र मान हलया गया। टीकाओं का जोर ऐसा हुअ दक मूल ग्रन्थ की टीका हुइ, दिर ईस टीका की भी टीका हुइ। टीका-दर-टीका की कहड़याँ छह-छह अठ-अठ तक की हगनती तक चलती रहं। आस तरह हचन्तन मं एक परतन्त्रता और मौहलकता के ऄभाि का जन्म हुअ। ग्यारहिं शताब्दी मं संमकृ त साहहत्य मं एक और शुरुअत हुइ। हनबन्ध-साहहत्य रचा जाने लगा। अप्टे के संमकृ त हहन्दी शब्दकोश मं हनबन्ध का एक ऄथष संग्रह-ग्रन्थ है। यहाँ िही ऄहभप्रेत है। हहन्दी साहहत्य की भूहमका के ऄनुसार हनबन्ध- साहहत्य मं लोकजीिन से सम्बद्ध छोटी मोटी सैकड़ं बातं का हिचार, हिश्लेषण और व्यिमथापन दकया गया है। ईसका सम्बन्ध तरह तरह के ऄनुष्ठानं तथा दैहनक जीिन मं व्यिहायष हिहध-हिधानं के साथ है। ‘अधुहनक युग के पाठक को जो बातं हनतान्त हनरथषक और हनष्प्रयोजन जान पड़ सकती हं, ईनके हलए आन ग्रन्थं के पन्ने के पन्ने रं गे हं।’ आनका संमकृ त मं HND : हहन्दी P1 : हहन्दी साहहत्य का आहतहास M1 : हहन्दी साहहत्य की पृष्ठभूहम हलहखत होना भी शायद ईनके परम्परासम्मत, प्रामाहणक और शास्त्रोक्त समझे जाने को ईदद्दि और कारणरूप रहा होगा, क्ययंदक संमकृ त आस दौरान रचना की माध्यम-भाषा लगभग नहं रह गइ थी। आस प्रिृहत्त के मूल मं भी शामत्र का लोकोन्मुखी रुझान समझा जा सकता है, हजसे अचायष हििेदी ने आस कालखडड की प्रकृ हत की तरह रे खांदकत दकया है। ममात्तष धमष की आस प्रिृहत्त का मूल कारण तत्कालीन सामाहजक पररहमथहत मं मौजूद था। शक, अभीर, कु षाण अदद ऄनेकानेक सैकड़ं जन-समुदाय पता नहं कब-कब भारतीय समाज का ऄंग बनते और िणष- व्यिमथा मं ऄपनी जगह पाकर ब्राह्मण-धमष के ऄन्दर शाहमल होते चले गए। िे ऄपने साथ तरह तरह के व्रत-पूजा-पािषण अदद हिधान और ऄपने ऄपने अराध्य भी लाए थे, हजनकी प्राचीन ग्रन्थं मं कोइ व्यिमथा नहं थी। आन समुदायं और ईनकी अचार-परम्पराओं को आस टीका साहहत्य और ऊहषयं के नाम पर हलहखत नए-नए ममृहत-ग्रन्थं और पुराण-ग्रन्थं मं दजष दकया गया। कु ल हमलाकर यह आतना जरटल जंजाल बन पड़ा होगा दक आसको हनयहमत और व्यिहमथत दकया जाना ज़रूरी था। हनबन्ध-ग्रन्थ ईसी का ईपक्रम हं। आसके िारा ममात्तष -पहडडत भी बौद्ध पहडडतं के समान लोकधमष की ओर झुकते हुए ददखाइ देते हं। प्रकारान्तर से आन ग्रन्थं को लोकधमष का शामत्र कहा जा सकता है। 6. मध्य देश की भाषा का हिकास और रूपान्तर अज की मिीकृ त, मथाहपत साहहहत्यक हहन्दी का दजाष खड़ी बोली के पररहनहष्ठत रूप को हमला हुअ है, लेदकन ऄतीत मं ऄलग ऄलग समय पर ऄलग ऄलग बोली के पास के न्रीय भाषा की जगह रही है। िमतुतः के न्रीय भाषा के ऄलािा भी आस प्रदेश मं ऄनेक मथानीय बोहलयाँ प्रचहलत रहती अइ हं। ईनमं से ऄनेक– हिशेषतः ब्रज और ऄिधी और ऄगर साहहत्य की िाहचक परम्परा को भी जोड़ हलया जाए, तो कौरिी, बुन्देली, बघेली, भोजपुरी, राजमथानी अदद- सभी के पास समृद्ध साहहहत्यक भाषा की ऄपनी हैहसयत मौजूद रही है। आस प्रदेश मं बोली जाने िाली सभी बोहलयं का सहम्महलत सामूहहक नाम हहन्दी है, लेदकन साहहहत्यक व्यिहार के हलए कोइ एक भाषा के न्रीय मथान पा लेती रही है। आसका ऄथष यह नहं दक ऄन्य बोहलयं मं क्षमता की दृहि से कोइ कमी है। के न्रीय साहहहत्यक भाषा के रूप मं दकसी बोली का मिीकृ त होना राजनीहतक, अर्मथक, धार्ममक, सांमकृ हतक अदद ऄनेक कारणं से घरटत होता है। आससे ऄनेकता और हिहिधता के बीच एकसूत्रता और सम्प्रेषणीयता सम्भि होती है। हहन्दी साहहत्य के आहतहास मं खड़ी बोली के ऄलािा ब्रज, ऄिधी और ऄन्य बोहलयं का साहहत्य भी यथोहचत रूप से सहम्महलत है। हहन्दी शब्द का प्रयोग बहुत व्यापक ऄथष मं होता अया है। भाषा के नाम के ऄलािा जाहत, प्रदेश और संमकृ हत के हिशेषण की तरह भी आसका प्रयोग होता है। 7. ऄपभ्रंश : पुरानी हहन्दी कु छ मतभेदं के हसिाय संित् 1050 कमोबेश सिषमान्य रूप से हहन्दी साहहत्य के अरम्भ की तरह मिीकृ त है। देश के आहतहास मं सातिं शताब्दी मध्यकाल का अरम्भ है, लेदकन हहन्दी साहहत्य के आहतहास मं आसे पृष्ठभूहम का दजाष ही ददया जा सकता है। हहन्दी साहहत्य की पृष्ठभूहम के ऄध्ययन के हलए सन् 700-1000 तक का कालखडड हिशेष रूप से महत्त्िपूणष है, क्ययंदक आस तकरीबन तीन सौ िषं मं पुरानी हहन्दी ऄथिा ‘ऄपभ्रंश’ ने हिहिध साहहत्यरूपं और पद्धहतयं मं HND : हहन्दी P1 : हहन्दी साहहत्य का आहतहास M1 : हहन्दी साहहत्य की पृष्ठभूहम हिकहसत और पररहनहष्ठत होकर साहहत्यभाषा का मथान पाया और अधुहनक अयषभाषाओं मं प्राकृ तं के रूपान्तर की कड़ी बनी। ऄपभ्रंश के सम्बन्ध मं प्राचीन ऄलंकारग्रन्थं मं दो प्रकार के परमपर हिरोधी मत हमलते हं। एक ओर रुरट के काव्यालंकार के टीकाकार नहमसाधु (सन् 1069 ऄपभ्रंश को प्राकृ त कहते हं तो दूसरी ओर भामह (छठी शती , दडडी (सातिं शती अदद अचायष ऄपभ्रंश का ईल्लेख प्राकृ त से हभन्न मितन्त्र काव्यभाषा के रूप मं करते हं। ऄपभ्रंश के शब्दकोश का ऄहधकांश, यहाँ तक दक नब्बे प्रहतशत, प्राकृ त से गृहीत है और व्याकरहणक गठन प्राकृ त रूपं से ऄहधक हिकहसत तथा अधुहनक भाषाओं के हनकट है। ऄपभ्रंश का प्रमुख व्याितषक लक्षण संमकृ त और प्राकृ त के संज्ञारूपं से हिभहक्त-प्रत्यय का ऄलग होना है। पाहल, प्राकृ त और ऄपभ्रंश मध्यकालीन अयषभाषाएँ थं। हिशुद्ध भाषाशामत्रीय दृहि से ऄपभ्रंश को आनमं से ऄहन्तम माना गया है। आसी ऄपभ्रंश से अधुहनक अयषभाषाओं का हिकास हुअ। पाहल के नामकरण की व्युत्पहत्त ‘पल्ली’ से हुइ हजसका ऄथष है ग्राम। ईसे हशि और नागर भाषा के हिलोम-भार पर ग्राम्य जन-समाज की भाषा समझा जा सकता है। ‘प्राकृ त’ की व्युत्पहत्त मं प्रकृ हत हनहहत है, हजसे संमकृ त के हिलोम-भार पर पुनः जनसामान्य की सहज प्राकृ हतक भाषा माना जा सकता है। प्राकृ तं की संख्या ऄनेक है। ऄपभ्रंश का अगमन ईसके बाद हुअ, लेदकन पाहल और प्राकृ त के हिपरीत ऄपभ्रंश एक ऐसा नामकरण है, हजसमं मियं ईसके ऄपने नाम की कम तथा दकसी ऄन्य का भ्रि या हिकृ त मिरूप होने की ध्िहन या ऄनुगूँज ऄहधक सुनाइ पड़ती है। ऄपभ्रंश के कहियं ने ऄपनी भाषा को के िल ‘भासा’, ‘देसी भासा’ ऄथिा ‘गामेल्ल भासा’; (ग्रामीण भाषा कहा है’ परन्तु संमकृ त के व्याकरणं और ऄलंकारग्रन्थं मं ईस भाषा के हलए प्रायः ‘ऄपभ्रंश’ तथा कहं- कहं ‘ऄपभ्रि’ संज्ञा का प्रयोग दकया गया है। आस प्रकार ऄपभ्रंश नाम संमकृ त के अचायं का ददया हुअ है, जो अपाततः हतरमकारसूचक प्रतीत होता है, लेदकन ऄन्ततः संज्ञा मं बदल कर के िल नामिाची रह गया और ऄनेक कहियं ने मियं भी ऄपनी भाषा को ‘ऄिहत्थ’ या ‘ऄिहट्ठ’ कहा। यह मानना सही नहं होगा दक ऄपभ्रंश का जन्म भी आन्हं तीन सौ िषं मं हुअ था। ईत्तरकालीन होने के बािजूद ऄपभ्रंश मं ऐसे ऄनेक प्रयोग पाए जाते हं जो िररुहच (इ.पू. 300) िारा प्राकृ त-प्रकाश मं िर्मणत साहहहत्यक प्राकृ त की ऄपेक्षा प्राचीनतर हं। ऄपभ्रंश के रूप और प्रयोग बहुत पहले से, सन् के प्रथम शतक से हनहश्चत, हनयहमत प्रचलन मं अ चुके थे। एक प्रहतहष्ठत, पररहनहष्ठत साहहहत्यक भाषा के साथ साथ लोकभाषा और लोकसाहहत्य के सह-ऄहमतत्ि की बात जानी पहचानी है। संमकृ त, प्राकृ त और ऄपभ्रंश भाषाओं मं भी लम्बे समय तक ऐसा सह-ऄहमतत्ि बना रहा। भाषा के हिकासक्रम मं ऐसा होता रहता है दक कालान्तर मं के न्रीय और मानक भाषा बनने िाली पररहनहष्ठत साहहहत्यक भाषा हमथर और मानक रूप धारण करके लोकसामान्य की समझ, पकड़ और पहुँच से बाहर जाती रहती है। जीिन्त लोकभाषा का मिरूप हनरन्तर गहतशील और िधषमान रहता है। के न्रीय साहहहत्यक भाषा बार बार ऄपनी लोकभाषा की जड़ं तक लौटकर खुद को िधषनशील और गहतमान बनाए रखती है। ऐसा भी होता है दक राजनीहतक अर्मथक अदद कारणं से के न्रीय भाषा के असन पर कोइ और बोली पदासीन हो जाती है। ऐसा भी हो सकता है दक हहन्दी-प्रदेश जैसे हिशाल भूभागं मं ऄलग ऄलग आलाकं मं ऄलग ऄलग बोहलयं को के न्रीय साहहहत्यक भाषा का दजाष प्राप्त हो। HND : हहन्दी P1 : हहन्दी साहहत्य का आहतहास M1 : हहन्दी साहहत्य की पृष्ठभूहम प्राकृ तं की संख्या चार बताइ गइ है - महाराष्ट्री, शौरसेनी, पैशाची और मागधी। प्राकृ त के प्राचीनतम िैयाकरण िररुहच ने आन्हं चार प्राकृ तं के नाम हगनाए हं। ईन्हंने ऄपने ‘प्राकृ त-प्रकाश’ के बारह ऄध्यायं मं से नौ ऄध्याय तथा कु ल 424 सूत्र महाराष्ट्री को ऄर्मपत दकए हं। शेष प्रत्येक भाषा के हलए एक के हहसाब से तीन ऄध्याय और तीन भाषाएँ। पैशाची के हलए 14 सूत्र, मागधी के हलए 17 सूत्र, शौरसेनी के हलए बत्तीस सूत्र ददए गए हं। प्रकट है दक मूल प्राकृ त महाराष्ट्री को मानते हुए हििेचन दकया गया है और शेष तीनं के हिहशि व्याितषक लक्षण ही हगनाए गए हं। महाराष्ट्री एक तरह से लोकसामान्य मानक साहहहत्यक भाषा रही प्रतीत होती है। महाराष्ट्री और शौरसेनी प्राकृ तं को हहन्दी प्रदेश की भाषाओं का पूिषिती रूप कहा जा सकता है। िह शायद एक ही भाषा की दो शैहलयं के नाम हं, क्ययंदक संमकृ त के नाटकं मं हमत्रयं को प्राकृ त बोलते हुए ददखाया गया है और िे शौरसेनी मं गद्य बोलती हं और महाराष्ट्री मं पद्य बोलती हं। शौरसेनी हनहश्चत रूप से पहश्चमी हहन्दी है और मागधी मगध यानी हबहार और बंगाल की भाषाओं का पूि-ष रूप है। हबहार की ऄनेक भाषाएँ हहन्दी के बोली-पररिार से ही सम्बद्ध हं। पैशाची के बारे मं ऄहधकांशतः ऄटकलं ही प्राप्त हं, ऄनुमान नहं दकया जा सका है दक िह िमतुतः दकस प्रदेश की भाषा थी। अचायष हजारीप्रसाद हििेदी का ऄनुमान है दक िह सम्भितः अयेतर जाहतयं िारा बोली जाने िाली अयषभाषा रही होगी जो ईच्चारण मं ईनके नाद-ऄभ्यास के ऄनुकूल हिकृ त हो गइ होगी। महाराष्ट्री, शौरसेनी और मागधी हहन्दी प्रदेश की भाषाओं की पूिषिती प्राकृ तं का नाम था। और िे ऄपभ्रंश के रामते हहन्दी मं ऄपने रूपान्तर तक अइ हंगी। ऄनेक हििान महाराष्ट्री को अधुहनक मराठी का पूिषरूप मानते हं, लेदकन अचायष हििेदी के ऄनुसार दोनं मं नामसाम्य के ऄहतररक्त हिशेष कु छ समान नहं है। 8. ऄपभ्रंश और अभीरजन ऄपभ्रंश को अरम्भ मं ही अभीरजन की भाषा की तरह ईहल्लहखत दकया गया था। पहश्चम तथा पहश्चमोत्तर प्रदेश मं अभीरजन का अहिभाषि हुअ था, जो बाहर से अए हुए लोग थे। ईनके सम्पकष से भाषा के सामान्यतः प्रचहलत प्राकृ त रूपं मं मिर-िैहचत्र्य और ईच्चारण-भेद और व्याकरण-िैहिध्य ईत्पन्न हुए हंगे, हजनके कारण प्राकृ तं के आन नए रूपं को ऄपभ्रंश कहा गया होगा। अचायष हजारीप्रसाद हििेदी ने आस सन्दभष मं भरत मुहन के नाट्डशामत्र (इ.पू. 200 से सन् 200 के बीच कभी रहचत का ईल्लेख दकया है। अचायष भरत मुहन ने हसन्धु, सौिीर तथा हहमालय के कु छ प्रदेशं मं प्रचहलत ईकारबहुल अभीरी भाषा का हजक्र दकया है, यद्यहप ईन्हंने ऄपभ्रंश का नाम नहं हलया है। संमकृ त शब्द अभीर का प्राकृ त भाषा मं ऄहीर हो जाता है। िे यदुिंशी, नन्दिंशी, ग्िालिंशी या गोपालं के साथ ऄहभन्न माने गए हं। ईनका ईद्गम रहमय मं हलपटा और हििाद मं डू बा हुअ है। ईनका व्यिसाय पशुपालन और दमयुिृहत्त बताया गया है। कु छ लोग ईन्हं एक अद्य राहिड़ी कबीले से जोड़ते हं, हजसने दहक्षण से ईत्तर को प्रिास दकया और ऄपने देिता और पूजा ईपासना की हिहधयाँ ऄपने साथ लेकर अए। आस हिषय मं पुराणं का साक्ष्य ददया जाता है। कु छ ईनको एक अक्रामक हिजेता लहर का ऄंग मानते हं – शायद शक – हजसका मूल ईद्गम हसहथया ऄथिा मध्य एहशया मं था। कु छ हििानं ने प्राचीन अभीरं को एक कबीला माना है, जबदक कु छ ऄन्यं ने एक नमल माना। पाहणहन, चाणक्यय और पतंजहल जैसे प्रहसद्ध प्राचीन संमकृ त हििानं ने ईनको हहन्दू धमष के भागित-सम्प्रदाय का ऄनुयायी बताया है। िे एक नमल रहे हं या एक कबीला, मिभाि से ही खानाबदोश रहे हं या हिमथाहपत या अक्रान्ता, लेदकन िे मथायी रूप से यहं बस गए और भारत भर मं िै ल गए। ईनका महत्त्िपूणष ईल्लेख महाभारत मं है और यदुिंशी कृ ष्ण ईनके महानायक हं। ग्रीक HND : हहन्दी P1 : हहन्दी साहहत्य का आहतहास M1 : हहन्दी साहहत्य की पृष्ठभूहम आहतहासकार प्टॉलेमी ने सन् 100 के ऄपने ग्रन्थ द पेररप्लस ऑफ़ द एररहियन सी मं भारत मं अभीरं की ईपहमथहत दजष की है। ईनके काल और मथान के बारे मं हनणाषयक रूप से प्राप्त ऐहतहाहसक तथ्यय िही है। अभीरं के हाथ मं राजसत्ता अइ, तो ईनकी भाषा ऄपभ्रंश को भी के न्रीय भाषा की सत्ता और साहहहत्यक भाषा का समादर प्राप्त हुअ होगा। सन् 600 मं भामह और दडडी के हसद्धान्त-ग्रन्थं मं ऄपभ्रंश की ऄनेक रचनाओं की पंहक्तयाँ और छन्द ईदाहरण के रूप मं ईद्धृत की गइ हं। ऄथाषत छठी शताब्दी मं ऄपभ्रंश मं ऐसा रचना-संचय हो चुका था हजसे भामह-दडडी जैसे अलंकाररकं ने ऄपने हसद्धान्त ग्रन्थं मं ईल्लेख के योग्य समझा था। निं शताब्दी मं राजशेखर ने ऄपने काव्यमीमांसा नामक हिशाल हिश्िकोश मं राज-दरबार मं ऄपभ्रंश-कहि के मथान की चचाष की है। अचायष हजारीप्रसाद हििेदी के ऄनुसार निं शताब्दी मं िह सौराष्ट्र से मगध तक िै ल चुकी थी और अभीर मूल से मुक्त होकर लोकभाषा का पद ग्रहण कर चुकी थी, लेदकन सामान्य लोकभाषा का मथान अभीरं िारा प्रोत्साहहत काव्यभाषा के पास ही था। बहुत सम्भि है दक साहहत्य की लोकोन्मुखता लोकभाषा को राज्याश्रय हमलने का ही पररणाम हो। आस प्रकार जो भाषा इसिी सन् की अरहम्भक सददयं मं अभीर अदद जाहतयं की लोकबोली थी, िह छठी शती से साहहहत्यक भाषा बन गइ और ग्यारहिं शती तक जाते-जाते हशििगष की भाषा तथा राजभाषा हो गइ। आस हिमतृत प्रचलन और समादर के बािजूद ऄपभ्रंश का साहहत्य प्रचुरता से संरहक्षत नहं हमला। आसका कारण भी शायद लोकभाषा और िाहचक परम्परा का पररितषनशील प्रिाह रहा हो। जानी पहचानी बात है दक मध्यकाल तक हलहखत रूप मं सुरहक्षत साहहत्य िही रहा, हजसे या तो राज्य का अश्रय हमला या दिर दकसी धार्ममक सम्प्रदाय का। जैन गुरु हेमचन्राचायष (1088-1178) ने ऄपने हसद्धहेमचन्र शब्दानुशासन नामक व्याकरण ग्रन्थ मं संमकृ त और प्राकृ तं के ऄलािा ऄपभ्रंश का व्याकरण भी सहम्महलत दकया। भामह-दडडी िारा ईद्धृत होकर जो काव्यात्मक मिीकृ हत और प्रहतष्ठा ऄपभ्रंश को हमली होगी, िह व्याकरण की रचना िारा सैद्धाहन्तक और शामत्रीय रूप से भी पुि हुइ होगी। ग्यारहिं शताब्दी मं अलंकाररक और िैयाकरण लक्ष्य कर चुके थे दक ऄपभ्रंश के रूपं मं प्रयोग-िैहिध्य और प्रकार- िैहिध्य है, कोइ एक हनहश्चत व्याकरण और एकरूपता नहं है। मथानभेद से िैहिध्य की व्याख्या की जा सकती है, लेदकन हेमचन्राचायष का व्याकरण एक ही ऄपभ्रंश की चचाष करता है। आसका कारण शायद यह रहा होगा दक व्याकरण मं बँधने लायक भाषा एक सुहमथर मानक रूप ले चुकी थी। यह िैहिध्य आस बात के हलए ऄनुमान-प्रमाण का अधार देता है दक ऄनेक प्राकृ त भाषाएँ आन रूपान्तरं से गुजरी हंगी और ऄनेक ऄपभ्रंशं का ऄहमतत्ि रहा होगा। िे अधुहनक भारतीय भाषाओं का पूिष रूप कही जा सकती हं। अचायष हजारीप्रसाद हििेदी ने हग्रयसषन की आस कल्पना का हिाला ददया है दक प्रत्येक अधुहनक अयषभाषा की एक ऄपनी ऄपभ्रंश भाषा भी रही होगी। यह के िल ऄनुमान-प्रमाण से कही गइ बात है, दकन्तु तकष संगत एिं सम्भाव्य है। क्ययंदक यह बात कु छ भरोसे लायक नहं लगती दक ऄनेक प्राकृ तं की के िल एक ही प्राकृ तोत्तर ऄपभ्रंश रही होगी और ईस एक ऄपभ्रंश से पुनः ऄनेक अधुहनक अयषभाषाएँ हिकहसत हो गइ हंगी। हेमचन्र के काव्योदाहरणं की भाषा मं ऄनेक बोहलयं का हमश्रण है। िह दकसी एक देश या काल की भाषा नहं है। िह एक के न्रीय साहहहत्यक भाषा-सी प्रतीत होती है। दोहा ईस समय का लोकहप्रय छं द बनता ददखाइ देता है। लेदकन ऄपनी- ऄपनी जगहं की ऄपभ्रंशं मं ऄपनी ऄपनी मथानीय हिशेषताएँ रही हंगी, आन्हं ऄपभ्रंश बोहलयं से साहहहत्यक ऄपभ्रंश का रूप हनहश्चत हुअ होगा। HND : हहन्दी P1 : हहन्दी साहहत्य का आहतहास M1 : हहन्दी साहहत्य की पृष्ठभूहम 9. ऄपभ्रंश का साहहत्य ऄपभ्रंश के साहहत्य को भाषाकाव्य कहने का चलन था। ईसके हिशाल लोकहिमतार को देखते हुए शायद यह ईहचत भी हो, लेदकन बहुत समय तक यह हिमतार ऄहधकांशतः ईल्लेखं ि ऄनुमान-प्रमाणं से ही हसद्ध रहा। ईसका िमतुतः प्राप्त साहहत्य बहुत ऄहधक नहं रहा और बहुत समय तक तो काहलदास की हिक्रमोिषशीय के कु छ प्रयोगं, ऄलंकारशामत्र और व्याकरणग्रन्थं मं प्राप्त कु छ ईल्लेखं और ईदाहरणं, िैतालपंचवििशहत तथा विसहासनिावित्रशहतका के ऄलािा ईसे लुप्त ही समझा जाता रहा था। बाद मं हमथहत बदली और पता चला हजन पुमतकं को प्राकृ त की रचना समझा जाता रहा था, ईनमं से बहुत ऄपभ्रंश की थं। 10. जैन ग्रन्थ जैन-भडडारं मं ऄनेक ऄपभ्रंश पुमतकं हमलं, जो जैन धमाषिलहम्बयं िारा जैनधमी हसद्धान्तं के हिषय मं हलहखत थं। मपितः ईसमं हसद्धान्त-हििेचन ऄहधक और साहहहत्यक सौन्दयष नगडय ददखाइ देता है। यहाँ हििेच्य हहन्दीभाषी भूभाग और भाषा-साहहत्य से जैन धमष का ज्यादा गहरा सम्बन्ध नहं रहा, लेदकन जैन धमष के प्रश्रय से संरहक्षत रचनाओं मं ऄपभ्रंश की संरचना और ईसके काव्यरूपं के हिषय मं हिमतृत और व्यिहमथत जानकारी संहचत और सुरहक्षत है, हजससे भाषा और साहहत्य के हिकास के एक पूरे ऄध्याय का ज्ञान हमलता है, आसहलए आन रचनाओं का महत्त्ि ऄसहन्दग्ध है। आन कहियं मं मियम्भू, पुष्पदन्त, धनपाल, जोआन्दु, मुहन रामविसह के नाम प्रमुख हं। अचायष हजारीप्रसाद हििेदी ने हहन्दी साहहत्य की भूहमका मं पुफ्ियन्त; पुष्पदन्तकृ त हतसरट्ठलक्यखण-महापुराण, मियम्भू कृ त पईमचररई, हररिंशपुराण, जसहर चररई, णायकु मार चररई के ऄलािा भहिसयत्त कहा, सणंकुमार चररई, संदेशरासक, मयणरे हासहन्ध, पईमहसरी चररई, िज्रमिाहमचररत्र, ऄन्तरं गसहन्ध, चौरं गसहन्ध, सुलसाख्यान, चच्चरी, भािनासार, परमात्मप्रकाश, अराधना, नमयासुन्दररसहन्ध अदद ऄनेक जैन रचनाओं के नाम हगनाए हं। ऄपभ्रंश के िैयाकरण हेमचन्र भी जैन अचायष थे। 11. आतर स्रोतं से प्राप्त ऄपभ्रंश रचनाएँ छन्दहिधान के हिषय मं हलहखत पुमतक प्राकृ तपंगलम् मं बहुत सी ऄपभ्रंश कहिताएँ ईदाहरण की तरह संकहलत हं। ऄब्दुलरहमान का संदेशरासक हिरहकाव्य है। पहडडत हरप्रसाद शामत्री के सम्पादन मं प्रकाहशत बौद्ध गान ओ दोहाकोश को बांग्ला हलहप के कारण ऄपभ्रंश की तरह पहचानने मं हिलम्ब हुअ। आसमं संकहलत दोहा की भाषा मं ऄपभ्रंश का पररहनहष्ठत रूप हमलता है, लेदकन पदं की भाषा मं पूिी भाषा के हचह्नं के कारण ईसे बाँगला, मैहथली, मगही, भोजपुरी, ओहड़या का भी पूिरू ष प माना गया। भाषािैज्ञाहनक दृहि से ऄध्ययन के हलए यह ऄत्यन्त महत्त्िपूणष मानी जा सकती है। बौद्ध धमष के सहजयान और िज्रयान सम्प्रदाय मं तन्त्र-मन्त्र का बोलबाला हो गया था। ईनके ऄनुयायी हसद्ध कहे जाते थे। हसद्धं की संख्या चौरासी मानी गइ है। हिषयिमतु के रूप मं काया-योग, सहज-शून्य की साधना और समाहध की तन्मयता को हलया गया है। आनमं से कु छ ऄहधक प्रहसद्ध नाम सरहपा, शबरपा, भुसुकपा, लुइपा आत्यादद हं। 12. ऄपभ्रंश काव्य के रूपबन्ध ऄपभ्रंश काव्य के रूपबन्ध बाद के हहन्दी साहहत्य मं हिरासत की तरह ऄनेक रूप-रूपान्तरं मं प्राप्त हुए और परम्परा का हिमतार बने। HND : हहन्दी P1 : हहन्दी साहहत्य का आहतहास M1 : हहन्दी साहहत्य की पृष्ठभूहम 12.1. चररत काव्य पद्धररया सोलह मात्रा का छन्द है, हजसकी अठ पंहक्तयं के साथ दूहा का घत्ता (हिराम देकर हजस पंहक्त-गुच्छ की रचना होती है, ईसे कड़बक कहते हं। दूहा-पद्धररया बन्ध मं कथाकाव्यं की रचना की गइ। जैन परम्परा मं ये चररत-काव्य कहलाए। मियम्भू का पईम-चररई, धनपाल का भहिसयत्त-कहा, पुष्पदन्त का जसहरचररई अदद तथा पूिोहल्लहखत सूची मं ऄन्य ऄनेक चररत-काव्यं के ईदाहरण हं। चररतकाव्यं मं परिती हहन्दी कथाकाव्यं के कथानकं, कथानक-रूदढ़यं, कहिप्रहसहद्धयं, छन्दयोजना िगैरह का पूिषरूप ददखाइ देता है। पहश्चमी हहन्दी मं दूहा-पद्धररया के समकक्ष पूिी हहन्दी मं दोहा- चौपाइ बन्ध का प्रयोग दकया जाता था। दोहा-चौपाइ बन्ध के प्रथम प्रयोक्ता हसद्ध सम्प्रदाय के बौद्ध कहि सरहपा थे। 12.2. मुक्तक काव्य दोहा या दूहा छन्द का प्रचुर ऐश्ियष ऄपभ्रंश मं प्रकट हुअ। हनगुषण की महहमा और धार्ममक ईपदेश, नीहत की हशक्षा, िीर और शृग ं ार सामान्यतः दूहा की रचना के हिषय हं। गेय पदं का हिपुल साहहत्य ऄपभ्रंश मं रहा होगा। हेमचन्र ने ऄपने प्राकृ त व्याकरण मं साहहहत्यक ऄपभ्रंश का हििेचन दकया है, दकन्तु ग्राम्य ऄपभ्रंश की भी चचाष की है, हजसमं रासक-डोहम्बका अदद प्रकार की गेय कृ हतयाँ रची जाती थं। अचायष हििेदी का ऄनुमान है दक सम्भितः रासक छन्द मं रहचत होने के कारण आनका यह नाम पड़ा होगा, दकन्तु बाद के हहन्दी साहहत्य मं रासक या रासो के नाम से कथाकाव्य ही शेष रहे। ऄपभ्रंश के गेय पद भी बहुत कम ही हमले, लेदकन गेय पदं की परम्परा हहन्दी साहहत्य मं बनी रही। 12.3. सन्धा भाषा ऄथिा ईलटबाँहसयाँ बौद्ध गान ओ दोहाकोश मं संकहलत हसद्ध साहहत्य मं बहुत-सी ऐसी रचनाएँ हं, हजनमं प्रकट रूप से ऐसा ऄथष सुनाइ देता है, जो लोकहिरुद्ध और कु हत्सत है, क्ययंदक ईसमं साधना की रहमयात्मक शब्दािली का प्रयोग दकया गया है और पररहचत शब्दं का एक गुह्य ऄहभप्रेत ऄथष ऄहभप्राय को बदल देता है। रहमयात्मक शब्दं के ऄथष की जानकारी साधनात्मक ऄथष को मपि कर देती है। आन िज्रयानी हसद्धं की यह ईलटबाँसी शैली शैि नाथपहन्थयं की ऐसी ही शैली के बहुत कु छ समान है। दोनं प्रकार के साधनामार्मगयं मं घहनष्ठ सम्बन्ध रह चुका था। नाथं की पूिषज परम्परा मं भी चौरासी हसद्ध हं और दोनं सूहचयं मं बहुत सारे नाम समान हं। ईलटबाँसी की परम्परा हहन्दी मं हनगुषण सन्तं तक चलती रही। सरहपा तो प्रथम हसद्ध माने ही जाते हं। आन्हं ही सहजयान का प्रितषक कहा गया है। 13. हनष्कषष पहश्चमी हसरे पर शौरसेनी और पूिी हसरे पर मागधी का हजक्र हहन्दी की पूिषिती प्राकृ तं के रूप मं दकया जा चुका है। ये दोनं हहन्दी साहहत्य के के िल दो हभन्न भाहषक मूल नहं, बहल्क दो हभन्न संमकार और अचार-हिचार को ऄहभव्यक्त करने िाले साहहत्य हं। दोनं प्रकार के साहहत्य दो हभन्न अयषजाहतयं के रचे हुए साहहत्य हं। पहश्चमी ऄपभ्रंश से चारण काव्य की राजमतुहत, ऐहतहाहसक, शृंगारी काव्य, लोकप्रचहलत कथानक तथा नीहत की िु टकल रचनाएँ अईं। पूिी ऄपभ्रंश से हनरगुहनयाँ सन्तं की शामत्र-हनरपेक्ष ईग्र हिचारधारा, पाखडड हिरोध मं झाड़ िटकार, ऄक्यखड़पना, सहजशून्य की HND : हहन्दी P1 : हहन्दी साहहत्य का आहतहास M1 : हहन्दी साहहत्य की पृष्ठभूहम साधना, योगपद्धहत और भहक्तमूलक रचनाएँ ईत्पन्न हुईं। हहन्दी मं पहश्चमी अयं की रूहऺढहप्रयता, कमषहनष्ठा के साथ पूिी अयं की भािप्रिणता, हिरोही िृहत्त, प्रेम-हनष्ठा को भी ऄहभव्यहक्त हमली। अधुहनक भाषाओं का हिकास ऄपभ्रंश से हुअ, दकन्तु हिशेष बात यह हुइ दक अधुहनक अयषभाषाओं मं संमकृ त शब्दं का पुनरागमन हुअ, जबदक ऄपभ्रंश मं िे लगभग ऄनुपहमथत हो चुके थे या तद्भि बन चुके थे, लेदकन हहन्दी, मराठी, बँगला, गुजराती अदद संमकृ त प्रचुर भाषाएँ बनं। हहन्दी साहहत्य के अददकाल ने ऄपनी पृष्ठभूहम से आस हिषयिमतु और संिेदना की हिरासत के साथ ऄपभ्रंश का भाषागत ईत्तराहधकार भी पाया, जो अगे चलकर हहन्दीभाषी प्रदेश की ऄनेक बोहलयं मं हिकहसत हुअ। अददकाल के मूधषन्य कहि चन्द बरदाइ हहन्दी के अददकहि भी हं और ऄपभ्रंश के ऄहन्तम कहि भी, हालाँदक ऄपभ्रंश की रचनाएँ पन्रहिं-सोलहिं सदी तक चलती रहं। HND : हहन्दी P1 : हहन्दी साहहत्य का आहतहास M1 : हहन्दी साहहत्य की पृष्ठभूहम