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Questions and Answers
अपभ्रंश साहित्य के संबंध में, निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही नहीं है?
अपभ्रंश साहित्य के संबंध में, निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही नहीं है?
- अपभ्रंश साहित्य मुख्य रूप से इस्लामी सिद्धांतों पर आधारित है। (correct)
- इसका साहित्य कालिदास की रचनाओं में भी पाया जाता है।
- इसे अक्सर भाषाकाव्य कहा जाता था।
- जैन ग्रंथों से इसकी रचनाओं के बारे में जानकारी मिलती है।
पहले अपभ्रंश साहित्य की उपलब्धता के बारे में क्या धारणा थी?
पहले अपभ्रंश साहित्य की उपलब्धता के बारे में क्या धारणा थी?
- यह साहित्य लगभग लुप्त माना जाता था। (correct)
- यह साहित्य मुख्य रूप से लोक कथाओं में ही सीमित था।
- यह साहित्य बहुत व्यापक रूप से उपलब्ध था।
- यह साहित्य केवल शाही दरबारों में पाया जाता था।
जैन ग्रंथों में अपभ्रंश साहित्य का मुख्य उद्देश्य क्या था?
जैन ग्रंथों में अपभ्रंश साहित्य का मुख्य उद्देश्य क्या था?
- धार्मिक सिद्धांतों का विवेचन करना। (correct)
- सामाजिक सुधारों का प्रचार करना।
- ऐतिहासिक घटनाओं का वर्णन करना।
- साहित्यिक सौंदर्य का प्रदर्शन करना।
हजारीप्रसाद द्विवेदी ने 'हिंदी साहित्य की भूमिका' में अपभ्रंश की किन रचनाओं का उल्लेख किया है?
हजारीप्रसाद द्विवेदी ने 'हिंदी साहित्य की भूमिका' में अपभ्रंश की किन रचनाओं का उल्लेख किया है?
अपभ्रंश साहित्य के विकास के संदर्भ में जैन ग्रंथों का क्या महत्व है?
अपभ्रंश साहित्य के विकास के संदर्भ में जैन ग्रंथों का क्या महत्व है?
निम्नलिखित में से कौन अपभ्रंश के प्रमुख कवियों में से एक नहीं है?
निम्नलिखित में से कौन अपभ्रंश के प्रमुख कवियों में से एक नहीं है?
अपभ्रंश के वैयाकरण कौन थे, जिनका जैन धर्म से भी संबंध था?
अपभ्रंश के वैयाकरण कौन थे, जिनका जैन धर्म से भी संबंध था?
अपभ्रंश साहित्य में 'संदेशरासक' किस प्रकार की रचना है?
अपभ्रंश साहित्य में 'संदेशरासक' किस प्रकार की रचना है?
अपभ्रंश साहित्य की पांडुलिपियाँ मुख्य रूप से कहाँ पाई गईं?
अपभ्रंश साहित्य की पांडुलिपियाँ मुख्य रूप से कहाँ पाई गईं?
अपभ्रंश साहित्य के अध्ययन से हमें किस अध्याय का ज्ञान मिलता है?
अपभ्रंश साहित्य के अध्ययन से हमें किस अध्याय का ज्ञान मिलता है?
प्राकृ तपंगलम् मं ऄपभ्रंश कहिताओ ंको कस रूप मं संकहलत ककया गया है?
प्राकृ तपंगलम् मं ऄपभ्रंश कहिताओ ंको कस रूप मं संकहलत ककया गया है?
संदेशरासक कसकी रचना है औि आसकी प्राकृ तत कैसी है?
संदेशरासक कसकी रचना है औि आसकी प्राकृ तत कैसी है?
बौद्ध गान ओि दोहाकोश के संपादन का कायय कसने ककया?
बौद्ध गान ओि दोहाकोश के संपादन का कायय कसने ककया?
बौद्ध गान ओि दोहाकोश मं संकहलत दोहो ंकी भाषा के बारे मं कौन-सा कथन सही है?
बौद्ध गान ओि दोहाकोश मं संकहलत दोहो ंकी भाषा के बारे मं कौन-सा कथन सही है?
बौद्ध धमय के ककस संप्रदाय मं तंत्र-मंत्र का बोलबाला था?
बौद्ध धमय के ककस संप्रदाय मं तंत्र-मंत्र का बोलबाला था?
हसद्धो ंके संदभय में, 'काया-योग, सहज-शून्य की साधना' ककससे संबंचधत हं?
हसद्धो ंके संदभय में, 'काया-योग, सहज-शून्य की साधना' ककससे संबंचधत हं?
निम्नलिखित मं से कौन-सा नाम ऄपभ्रंश के हसद्धं मं शाशमल नहीं है?
निम्नलिखित मं से कौन-सा नाम ऄपभ्रंश के हसद्धं मं शाशमल नहीं है?
ऄपभ्रंश काव्य के रूपबंध का हिंदी साहहत्य पर क्या प्राभाि पड ा?
ऄपभ्रंश काव्य के रूपबंध का हिंदी साहहत्य पर क्या प्राभाि पड ा?
हहिंदी भाषा के विकास की यात्रा में अन्य भाषाओं के योगदान को समझने का मुख्य उद्देश्य क्या है?
हहिंदी भाषा के विकास की यात्रा में अन्य भाषाओं के योगदान को समझने का मुख्य उद्देश्य क्या है?
हहिंदी साहित्य के निर्माण में हिंदी से पूर्व के साहित्य की भूमिका से परिचित होने का क्या लाभ है?
हहिंदी साहित्य के निर्माण में हिंदी से पूर्व के साहित्य की भूमिका से परिचित होने का क्या लाभ है?
किस घटना ने हिंदी साहित्य में भाषा, विचार और दर्शन के क्षेत्र में हलचल पैदा की?
किस घटना ने हिंदी साहित्य में भाषा, विचार और दर्शन के क्षेत्र में हलचल पैदा की?
महत् परंपराएँ लोकग्राह्य होने के क्रम में किस प्रक्रिया से गुजरती हैं?
महत् परंपराएँ लोकग्राह्य होने के क्रम में किस प्रक्रिया से गुजरती हैं?
लघु परंपराएँ साहित्य रचना के माध्यम से क्या प्राप्त करती हैं?
लघु परंपराएँ साहित्य रचना के माध्यम से क्या प्राप्त करती हैं?
बौद्ध, जैन और ब्राह्म विचार और दर्शन किस भाषा से छनकर पुरानी हिंदी में अभिव्यक्त हुए?
बौद्ध, जैन और ब्राह्म विचार और दर्शन किस भाषा से छनकर पुरानी हिंदी में अभिव्यक्त हुए?
महत्परम्परा का संबंध समाज के किस वर्ग से है?
महत्परम्परा का संबंध समाज के किस वर्ग से है?
महत्परम्परा समाज में किसकी भूमिका निभाती है?
महत्परम्परा समाज में किसकी भूमिका निभाती है?
लघु परम्परा, महत्परम्परा से किस प्रकार जुड़ी होती है?
लघु परम्परा, महत्परम्परा से किस प्रकार जुड़ी होती है?
हिंदी साहित्य का आदिकाल किस ऐतिहासिक कालखंड के बीच का समय है?
हिंदी साहित्य का आदिकाल किस ऐतिहासिक कालखंड के बीच का समय है?
हिंदी साहित्य के आदिकाल को 'आदिकाल' क्यों कहा जाता है, जबकि इसके पीछे चिंतन और सृजन की हजार वर्ष की ऐतिहासिक पीठिका मौजूद है?
हिंदी साहित्य के आदिकाल को 'आदिकाल' क्यों कहा जाता है, जबकि इसके पीछे चिंतन और सृजन की हजार वर्ष की ऐतिहासिक पीठिका मौजूद है?
निम्नलिखित में से कौन-सा कथन महत्परम्परा के सन्दर्भ में सही है?
निम्नलिखित में से कौन-सा कथन महत्परम्परा के सन्दर्भ में सही है?
हिंदी साहित्य के आदिकाल में किस भाषा को साहित्यिक मान्यता और प्रतिष्ठा मिली?
हिंदी साहित्य के आदिकाल में किस भाषा को साहित्यिक मान्यता और प्रतिष्ठा मिली?
लघु परंपराएँ महत्परंपरा से जुड़कर किस रूप में अभिव्यक्त होती हैं?
लघु परंपराएँ महत्परंपरा से जुड़कर किस रूप में अभिव्यक्त होती हैं?
हिंदी साहित्य के आदिकाल की एक महत्वपूर्ण विशेषता क्या है?
हिंदी साहित्य के आदिकाल की एक महत्वपूर्ण विशेषता क्या है?
आचायष हजारीप्रसाद हििेदी के अनुसार, तांह्त्रकं का 'अगम' शब्द ककस भाषा से अए हुए 'अचार' का ऄथष देता है?
आचायष हजारीप्रसाद हििेदी के अनुसार, तांह्त्रकं का 'अगम' शब्द ककस भाषा से अए हुए 'अचार' का ऄथष देता है?
मध्यदेश की सांमकृ हतक मिष्यादाओ ंके कारण बौद्ध मठं के ईठ जाने के बाद क्या शेष रह गया?
मध्यदेश की सांमकृ हतक मिष्यादाओ ंके कारण बौद्ध मठं के ईठ जाने के बाद क्या शेष रह गया?
महायान के प्रभाि से धमषसम्मत लोकव्यिहार मं कौन सी बातं शाहमल हुईं?
महायान के प्रभाि से धमषसम्मत लोकव्यिहार मं कौन सी बातं शाहमल हुईं?
शंकराचायष की मथापनाओं और व्याख्याओं के बाद पुनरुज्जीहित ब्राह्मण-धमष मं ककस की संकल्पना शाहमल हो चुकी थी?
शंकराचायष की मथापनाओं और व्याख्याओं के बाद पुनरुज्जीहित ब्राह्मण-धमष मं ककस की संकल्पना शाहमल हो चुकी थी?
बौद्ध-धमष के मूल ईपदेश ककस भाषा मं थे, पर आस समय तक कौन सी भाषा के ग्रन्थ ऄहधक हिश्िसनीय हो ईठे थे?
बौद्ध-धमष के मूल ईपदेश ककस भाषा मं थे, पर आस समय तक कौन सी भाषा के ग्रन्थ ऄहधक हिश्िसनीय हो ईठे थे?
सहजयान और िज्रयान ककस साधना के रूप मं हिकहसत हुए?
सहजयान और िज्रयान ककस साधना के रूप मं हिकहसत हुए?
ककस सम्प्रदाय के हभन्न हभन्न प्रकृ हत के देिताओं की पूजा भारतीय गृहमथ अज भी करता है?
ककस सम्प्रदाय के हभन्न हभन्न प्रकृ हत के देिताओं की पूजा भारतीय गृहमथ अज भी करता है?
सातिं-अठिं शताब्दी मं पुनरुज्जीहित ब्राह्मण-धमष ककसकी मथापनाओं और व्याख्याओं िारा ऄपना हपछला रूप बहुत कु छ बदल चुका था?
सातिं-अठिं शताब्दी मं पुनरुज्जीहित ब्राह्मण-धमष ककसकी मथापनाओं और व्याख्याओं िारा ऄपना हपछला रूप बहुत कु छ बदल चुका था?
महायान ककसके साथ समन्िय के पररणाममिरूप बौद्ध-श्रमण-परम्परा मं नया अयाम था?
महायान ककसके साथ समन्िय के पररणाममिरूप बौद्ध-श्रमण-परम्परा मं नया अयाम था?
शंकराचायष को ककसका समन्िय के पररणाममिरूप प्रच्छन्न बौद्ध भी कहा गया था?
शंकराचायष को ककसका समन्िय के पररणाममिरूप प्रच्छन्न बौद्ध भी कहा गया था?
ककसकी सहजता मं लोकमत की प्रधानता से शुरू होकर महायान ईसी मं घुलकर लुप्त हो गया?
ककसकी सहजता मं लोकमत की प्रधानता से शुरू होकर महायान ईसी मं घुलकर लुप्त हो गया?
ककसके अनुसार परमपर हिरुद्ध हिश्िासं और हिचारं का समन्िय भारतीय लोकधमष की ऄपनी हिहशिता है?
ककसके अनुसार परमपर हिरुद्ध हिश्िासं और हिचारं का समन्िय भारतीय लोकधमष की ऄपनी हिहशिता है?
छठी-सातिं शताब्दी तक संमकृ त के हिशाल भडडार मं से कौन से ग्रन्थ अत्मोपलब्ध ज्ञान और प्रत्यक्ष जीिन के हबचौहलये रह गए थे?
छठी-सातिं शताब्दी तक संमकृ त के हिशाल भडडार मं से कौन से ग्रन्थ अत्मोपलब्ध ज्ञान और प्रत्यक्ष जीिन के हबचौहलये रह गए थे?
हजन ददनं महायान लोकधमष रूप लेता हुअ साधारण जनजीिन मं ऄपनी पैठ बना रहा था, ईन ददनं कौन सा धमष लोक-साधारण से ईत्तरोत्तर ऄलग होता जा रहा था?
हजन ददनं महायान लोकधमष रूप लेता हुअ साधारण जनजीिन मं ऄपनी पैठ बना रहा था, ईन ददनं कौन सा धमष लोक-साधारण से ईत्तरोत्तर ऄलग होता जा रहा था?
भारतीय लोकधमष की हिहशिता क्या है?
भारतीय लोकधमष की हिहशिता क्या है?
आचायष हजारीप्रसाद हििेदी ने मध्यदेश को ककस रूप मं िहणषत दकया है?
आचायष हजारीप्रसाद हििेदी ने मध्यदेश को ककस रूप मं िहणषत दकया है?
हहन्दी साहहत्य का आददकाल कब से कब तक माना जाता है?
हहन्दी साहहत्य का आददकाल कब से कब तक माना जाता है?
आचायष रामचन्र शुक्ल ने हहन्दी साहहत्य के हिकास को ककसके सन्दभष मं देखा?
आचायष रामचन्र शुक्ल ने हहन्दी साहहत्य के हिकास को ककसके सन्दभष मं देखा?
आचायष हजारीप्रसाद हििेदी ने हहन्दी साहहत्य के हिकास को ककस रूप मं देखा?
आचायष हजारीप्रसाद हििेदी ने हहन्दी साहहत्य के हिकास को ककस रूप मं देखा?
हहन्दी साहहत्य की पृष्ठभूहम के ऄध्ययन के दो महत्वपूणष पक्ष कौन से हं?
हहन्दी साहहत्य की पृष्ठभूहम के ऄध्ययन के दो महत्वपूणष पक्ष कौन से हं?
जातीय मानहसकता का साहहत्य पर क्या प्रभाि होता है?
जातीय मानहसकता का साहहत्य पर क्या प्रभाि होता है?
मध्यदेश मं ककस चीज का रक्षण बना रहता है, जबदक हिचारं मं गहतशीलता होती है?
मध्यदेश मं ककस चीज का रक्षण बना रहता है, जबदक हिचारं मं गहतशीलता होती है?
हहन्दीभाषी राज्यं मं कौन-से राज्य शाहमल हं?
हहन्दीभाषी राज्यं मं कौन-से राज्य शाहमल हं?
अचायष हजारीप्रसाद हििेदी ने मध्यदेश के बारे मं क्या िहषत दकया है?
अचायष हजारीप्रसाद हििेदी ने मध्यदेश के बारे मं क्या िहषत दकया है?
मध्यदेश की सांस्कृहतक हिशेषता क्या है?
मध्यदेश की सांस्कृहतक हिशेषता क्या है?
हहन्दी साहहत्य के आददकाल मं कौन-सी महत्वपूणष घटना घटी?
हहन्दी साहहत्य के आददकाल मं कौन-सी महत्वपूणष घटना घटी?
अचायष रामचन्र शुक्यल ने हहन्दी साहहत्य के हिकास पर ककस पहलू पर हििेष ध्यान ददया?
अचायष रामचन्र शुक्यल ने हहन्दी साहहत्य के हिकास पर ककस पहलू पर हििेष ध्यान ददया?
हजारीप्रसाद हििेदी के अनुसार, आमलाम के अगमन का हहन्दी साहहत्य पर क्या प्रभाि पड़ा?
हजारीप्रसाद हििेदी के अनुसार, आमलाम के अगमन का हहन्दी साहहत्य पर क्या प्रभाि पड़ा?
हहन्दी साहहत्य की पृष्ठभूहम के ऄध्ययन मं 'भारतीय हचन्ता का स्वाभाहिक हिकास' से क्या ऄहभप्राय है?
हहन्दी साहहत्य की पृष्ठभूहम के ऄध्ययन मं 'भारतीय हचन्ता का स्वाभाहिक हिकास' से क्या ऄहभप्राय है?
हहन्दी साहहत्य पर तात्काहलक पररहमथहतयं का क्या प्रभाि होता है?
हहन्दी साहहत्य पर तात्काहलक पररहमथहतयं का क्या प्रभाि होता है?
शौरसेनी और मागधी प्राकृत भाषाएँ हहन्दी साहहत्य के हकन दो हभन्न तत्त्वं का प्रहतहनधित्व करती हैं?
शौरसेनी और मागधी प्राकृत भाषाएँ हहन्दी साहहत्य के हकन दो हभन्न तत्त्वं का प्रहतहनधित्व करती हैं?
पश्चिमी अपभ्रंश से कस प्रकार का साहहत्य ईत्पन्न हुअ?
पश्चिमी अपभ्रंश से कस प्रकार का साहहत्य ईत्पन्न हुअ?
पूिी अपभ्रंश की मुख्य हिशेषता क्या थी?
पूिी अपभ्रंश की मुख्य हिशेषता क्या थी?
आधुहनक भाषाओं के हिकास के संदभष मं अपभ्रंश से क्या हभन्नता पाई जाती है?
आधुहनक भाषाओं के हिकास के संदभष मं अपभ्रंश से क्या हभन्नता पाई जाती है?
हहन्दी साहहत्य के आददकाल ने अपभ्रंश से क्या प्राप्त दकया?
हहन्दी साहहत्य के आददकाल ने अपभ्रंश से क्या प्राप्त दकया?
चन्द बरदाइ के संबंध मं क्या सही है?
चन्द बरदाइ के संबंध मं क्या सही है?
अधुहनक हहन्दी मं पूिी और पहश्चमी संस्कृहतयं के अयं को कस प्रकार समाहहत दकया गया है?
अधुहनक हहन्दी मं पूिी और पहश्चमी संस्कृहतयं के अयं को कस प्रकार समाहहत दकया गया है?
पूिी अपभ्रंश से हनरगुहनयाँ सन्तं की ईग्र हिचारधारा का हिकास हकस प्रकार हुअ?
पूिी अपभ्रंश से हनरगुहनयाँ सन्तं की ईग्र हिचारधारा का हिकास हकस प्रकार हुअ?
अधुहनक भाषाओं मं संमकृ त शब्दं का पुनरागमन हकस बात का संकेत देता है?
अधुहनक भाषाओं मं संमकृ त शब्दं का पुनरागमन हकस बात का संकेत देता है?
अपभ्रंश की रचनाएँ कब तक चलती रहं?
अपभ्रंश की रचनाएँ कब तक चलती रहं?
Flashcards
पाठ का ईद्देश्य
पाठ का ईद्देश्य
हहन्दी भाषा के ितषमान मिरूप को समझना।
भाषा योगदान
भाषा योगदान
हहन्दी भाषा के हिकास मं ऄन्य भाषाओं का योगदान समझना।
पूिष साहहत्य की भूहमका
पूिष साहहत्य की भूहमका
हहन्दी साहहत्य की हनर्ममहत मं पूिष के साहहत्य की भूहमका से पररहचत होना।
ऐहतहाहसक प्रिेश
ऐहतहाहसक प्रिेश
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साहहत्य का रुख
साहहत्य का रुख
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लघु परम्पराएँ
लघु परम्पराएँ
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दशषनन का समावेश
दशषनन का समावेश
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महत्परम्परा
महत्परम्परा
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ज्ञान का दीपक
ज्ञान का दीपक
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लघु परम्परा अहभव्यहि
लघु परम्परा अहभव्यहि
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हहन्दी साहहत्य
हहन्दी साहहत्य
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अददकाल का समय
अददकाल का समय
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भाषा का अरहम्भक मिरूप
भाषा का अरहम्भक मिरूप
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साहहहत्यक मिीकृ हत
साहहहत्यक मिीकृ हत
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पररितषन
पररितषन
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प्राकृतपैंगलम्
प्राकृतपैंगलम्
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संदेशरासक
संदेशरासक
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बौद्ध गान ओ दोहाकोश
बौद्ध गान ओ दोहाकोश
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सिद्ध
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प्रमुख सिद्ध
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सिद्धों के विषय
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अपभ्रंश काव्य का प्रभाव
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अपभ्रंश काव्य के रूपबन्ध
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भाषा काव्य
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अपभ्रंश के प्रारंभिक स्रोत
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जैन ग्रंथ
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जैन ग्रंथों की विशेषता
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जैन धर्म और अपभ्रंश
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अपभ्रंश की जानकारी का स्रोत
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अपभ्रंश के प्रमुख कवि
अपभ्रंश के प्रमुख कवि
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हजारीप्रसाद द्विवेदी और जैन रचनाएँ
हजारीप्रसाद द्विवेदी और जैन रचनाएँ
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हेमचंद्र
हेमचंद्र
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सहजयान और वज्रयान
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नामजप
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अवतारवाद
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भारतीय लोकधर्म की विशेषता
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पूजा-साधना की विधियाँ
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महायान की परिणति
महायान की परिणति
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पुनरुज्जीवित ब्राह्मण धर्म
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शंकराचार्य और बौद्ध धर्म का समन्वय
शंकराचार्य और बौद्ध धर्म का समन्वय
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सर्वभूत-हितवाद
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जीवोद्धार में विश्वास
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बोधि सत्त्व
बोधि सत्त्व
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बुद्धगण
बुद्धगण
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भौतिक जगत की प्रकृति
भौतिक जगत की प्रकृति
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कर्मकांड और तंत्र-मंत्र
कर्मकांड और तंत्र-मंत्र
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महायान की विशेषताएँ
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मध्यदेश क्या है?
मध्यदेश क्या है?
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मध्यदेश की संसकृहत कैसी है?
मध्यदेश की संसकृहत कैसी है?
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हहंदी साहहत्य का अददकाल कब से कब तक था?
हहंदी साहहत्य का अददकाल कब से कब तक था?
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आमलाम का भारत आगमन कसने प्रभाि डाला?
आमलाम का भारत आगमन कसने प्रभाि डाला?
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हहंदी साहहत्य मं पररितषन का मुख्य कारण क्या था?
हहंदी साहहत्य मं पररितषन का मुख्य कारण क्या था?
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रामचन्र शुक्यल ने हहंदी साहहत्य को कैसे देखा?
रामचन्र शुक्यल ने हहंदी साहहत्य को कैसे देखा?
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हजारीप्रसाद हििेदी का योगदान क्या था?
हजारीप्रसाद हििेदी का योगदान क्या था?
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हजारीप्रसाद हििेदी का क्या मत था?
हजारीप्रसाद हििेदी का क्या मत था?
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साहहत्य की रचना कसे होती है?
साहहत्य की रचना कसे होती है?
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जातीय मानहसकता का क्या कायष है?
जातीय मानहसकता का क्या कायष है?
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जातीय मानहसकता की दोहरी भहूमका क्या है?
जातीय मानहसकता की दोहरी भहूमका क्या है?
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पृष्ठभूहम का ऄध्ययन क्या है?
पृष्ठभूहम का ऄध्ययन क्या है?
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भारतीय हचन्ता का मुख्य तत्व क्या है?
भारतीय हचन्ता का मुख्य तत्व क्या है?
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साहहत्य और समाज का कसा सम्बन्ि है?
साहहत्य और समाज का कसा सम्बन्ि है?
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जातीय मानहसकता का गठन कैसे होता है?
जातीय मानहसकता का गठन कैसे होता है?
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हहन्दी की पूिषिती प्राकृतें क्या हं?
हहन्दी की पूिषिती प्राकृतें क्या हं?
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शौरसेनी और मागधी हं क्या?
शौरसेनी और मागधी हं क्या?
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पहश्चमी ऄपभ्रंश से क्या अया?
पहश्चमी ऄपभ्रंश से क्या अया?
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पूिी ऄपभ्रंश से क्या ईत्पन्न हुअ?
पूिी ऄपभ्रंश से क्या ईत्पन्न हुअ?
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हहन्दी मं दोनं अयं क्या हं?
हहन्दी मं दोनं अयं क्या हं?
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अधुहनक भाषाओं मं क्या बदला?
अधुहनक भाषाओं मं क्या बदला?
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कौन सी भाषाएँ संमकृ त प्रचुर हं?
कौन सी भाषाएँ संमकृ त प्रचुर हं?
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अददकाल ने पीछे से क्या पाया?
अददकाल ने पीछे से क्या पाया?
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अददकाल के प्रमुि कहि कौन थे?
अददकाल के प्रमुि कहि कौन थे?
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ऄपभ्रंश कब तक चली?
ऄपभ्रंश कब तक चली?
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Study Notes
विषय: हिन्दी साहित्य का इतिहास: पृष्ठभूमि
- यह पाठ हिन्दी भाषा के वर्तमान स्वरूप और विकास में अन्य भाषाओं की भूमिका को समझने में मदद करेगा।
- यह हिन्दी साहित्य के निर्माण में पूर्व साहित्य के योगदान को भी स्पष्ट करेगा।
प्रस्तावना
- हिन्दी भाषा और साहित्य का निर्माण भारतवर्ष के उत्तर-पश्चिम सीमांत से विजयदृप्त इस्लाम के प्रवेश के साथ शुरू हुआ।
- इस समय में, भाषा, विचार, दर्शन में परिवर्तन हुए और साहित्य शास्त्र से लोक की ओर उन्मुख हुआ।
- महत् परम्पराएं लोकग्राह्य होने के लिए लोकभाषा में समाहित हुईं, जबकि लघु परम्पराएं साहित्य रचना के माध्यम से प्रतिष्ठित हुईं।
- बौद्ध, जैन और ब्राह्म विचार और दर्शन पुरानी हिन्दी में अभिव्यक्त हुए और देशकाल के सन्दर्भ में विकसित हुए।
- महत्परम्परा सुशिक्षित और चिंतनशील वर्ग के साथ है, जो सांस्कृतिक ज्ञानराशि के विश्लेषण और सर्जन में समर्थ है और समाज को मार्गदर्शन देती है।
- लघु परम्परा लोकविश्वासों, संस्थाओं और लोककथाओं के माध्यम से लोकसाहित्य का निर्माण करती है।
- हिन्दी साहित्य को आदिकाल से ही एक प्रौढ़ और पुष्ट लोक-साहित्य के रूप में देखा जा सकता है।
- हिन्दी साहित्य का आदिकाल मध्यकाल के बीच का समय है, जो तत्कालीन लोकभाषा की साहित्यिक स्वीकृति और प्रतिष्ठा का काल है।
मध्यदेश: हिंदीभाषी भूभाग
- आज के भारत में राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार हिंदी भाषी राज्य हैं।
- प्राचीनकाल में मध्यदेश के नाम से जाना जाने वाला यह क्षेत्र विभिन्न संस्कृतियों से घिरा हुआ है।
- हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार, मध्यदेश चौमुखी संस्कृतियों से घिरा हुआ रक्षणशील और पवित्रताभिमानी है।
- विभिन्न संस्कृतियों के कारण यहां वैचारिक गतिशीलता और अन्य धर्मों के लिए सहनशीलता है।
- मध्यदेश में हिन्दी साहित्य का आदिकाल संवत् 1050 से 1375 तक घटित हुआ, जिसमें इस्लाम का भारत में आगमन एक महत्त्वपूर्ण घटना थी।
- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने हिन्दी साहित्य के विकास को इस्लाम के आगमन के संदर्भ में देखा।
- हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इसे भारतीय चिंतन के स्वाभाविक विकास के रूप में देखा, भले ही इस्लाम न भी आया होता।
श्रमण-परम्परा तथा ब्रह्म-चिन्तन-परम्परा
- प्राचीन बौद्ध तथा जैन धर्मग्रन्थों से श्रमण परम्पराओं का आगमन हुआ।
- इसमें विरक्तिप्रधान बौद्ध और जैन परम्पराएँ और उनका करुणापुष्ट धर्म शामिल है।
- ये निरीश्वरवादी परम्पराएँ वैदिक कर्मकाण्ड और बलि-परम्परा के विरुद्ध थीं।
- ब्राह्मण परम्परा वेद, उपनिषद और स्मृतियों से संबंधित है और ब्रह्म को मोक्ष का आधार मानती है।
- शंकराचार्य के अद्वैत मत की स्थापना से ब्राह्मण धर्म का पुनरुज्जीवन हुआ।
- हिन्दी साहित्य का इतिहास इन दोनों जीवनदृष्टियों के उलझने- सुलझने-समन्वित होते रहने का इतिहास है।
- ईसा की सातवीं शताब्दी तक बौद्ध धर्म प्रबल था, जो हीनयान और महायान में विभाजित हो गया।
- महायान जनसाधारण के साथ सम्पृक्त होकर सहजयान और वज्रयान में विकसित हुआ।
आचार-विचार की सहजता और कट्टरता का अभाव
- महायान शाखा की व्यापक सत्ता में सहायक हुआ।
- मौर्य सम्राट अशोक के प्रयत्नों से बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार ई.पू. वर्षों में ही आरम्भ हो चुका था।
- बौद्ध साधना के साथ शैव और शाक्त उपासनाओं के योग से सहजयान और वज्रयान तन्त्रसाधना के रूप में विकसित हुए।
- परवर्ती शास्त्र-निरपेक्ष सन्त-साहित्य पर नामजप और बौद्ध तत्त्ववाद के निशान दिखाई देते हैं।
- अवतारवाद की शास्त्र-सापेक्ष भावधारा के भक्तों पर भी महायान का प्रभाव पड़ा। परस्पर विरुद्ध विश्वासों और विचारों का ऐसा समन्वय भारतीय लोकधर्म की अपनी विशिष्टता है।
- आचार्य द्विवेदी के अनुसार, भारतीय गृहस्थ आज भी परस्पर विरोधी मतों को मानने वाले साधुओं और भिन्न-भिन्न सम्प्रदायों के भिन्न भिन्न प्रकृति के देवताओं की पूजा करता है।
- मध्यदेश के सांस्कृतिक स्वभाव के अनुकूल आचार-व्यवहार की रक्षणशीलता के चलते बौद्ध मठों के उठ जाने के बाद भी पूजा-साधना की विधियाँ शेष रहीं
- महायान अपने आचार-व्यवहार की सहजता में लोकमत की प्रधानता के कारण उसी में घुलकर लुप्त हो गया।
- ब्राह्मण धर्म लोक-साधारण से उत्तरात्तर अलग होता जा रहा था।
- पुनरुज्जीवित ब्राह्मण-धर्म शंकराचार्य की स्थापनाओं और व्याख्याओं द्वारा अपना पिछला रूप बहुत कुछ बदल चुका था।
- बौद्ध-धर्म की 'शून्य' की संकल्पना उसमें शामिल हो चुकी थी। इस समन्वय के परिणामस्वरूप शंकर को प्रच्छन्न बौद्ध भी कहा गया था।
- महायान के प्रभाव से धर्मसम्मत लोकव्यवहार में सर्वभूत-हितवाद और जीवोद्धार में विश्वास शामिल हुए।
- बुद्ध (लोकव्यवहार में ईश्वर) में विश्वास अटूट था और नामजप से निर्वाण का आश्वासन था।
संस्कृत साहित्य
- साहित्य और चिंतन पर महायान का प्रभाव वैचारिक था।
- आलोच्य प्रदेश और काल में सामाजिक जीवन में आचार-व्यवहार का मेरुदण्ड स्मार्त्त विचार बना रहा।
- संस्कृत ईस्वी सन् के बाद भी संस्कृत चिंतन और सर्जन का माध्यम बनी रही, लेकिन लोकजीवन की भाषा बदल गई।
- संस्कृत की रचना परम्परा में लोकजीवन के साथ सम्पृक्ति का भाव कम हो गया।
- आलोच्यकाल की उल्लेखनीय संस्कृत रचनाओं में नागानन्द, अवधूत-गीता, गीतगोविन्द, कथासरित्सागर और बृहत्कथामंजरी शामिल हैं।
- संस्कृत में मौलिक रचना की बजाय टीका-लेखन की प्रवृत्ति शुरू ज्ञान को परम्परा-सिद्ध ज्ञान से घटकर मानने के कारण हुई।
- दसवीं शताब्दी के दार्शनिक अभिनवगुप्त ने अपना समस्त मौलिक चिन्तन टीकाओं के माध्यम से प्रस्तुत किया।
प्रामाणिक और शास्त्रोक्त समझा जाना
- प्रस्थानत्रयी के अलावा सभी आचार्यों के ग्रन्थों को टीका का योग्य सुपात्र मान लिया गया और टीका-दर-टीका की कड़ियाँ बढ़ती गईं।
- ग्यारहवीं शताब्दी में निबन्ध-साहित्य रचा जाने लगा, जिसमें लोकजीवन से सम्बद्ध बातों का विचार किया गया।
- संस्कृत इस दौरान रचना की माध्यम-भाषा लगभग नहीं रह गई थी।
- प्रवृत्ति के मूल में शास्त्र का लोकोन्मुखी रुझान है।
- आचार्य द्विवेदी के अनुसार 'भारतीय गृहस्थ आज भी विभिन्न मतों को मानने वाले साधुओं की पूजा करता है।'
- समुदायों और उनकी आचार-परम्पराओं को टीका साहित्य और पुराण-ग्रन्थों में दर्ज किया गया।
- निबंध-ग्रन्थों से स्मार्त्त-पण्डित भी बौद्ध पण्डितों के समान लोकधर्म की ओर झुकते हुए दिखाई देते हैं।
मध्य देश की भाषा का विकास और रूपांतरण
- स्वीकृत साहित्यिक हिंदी का दर्जा खड़ी बोली के परिनिष्ठित रूप को मिला हुआ है।
- अतीत में अलग-अलग समय पर केंद्रीय भाषा की जगह अलग-अलग बोलियों के पास रही है।
- केंद्रीय भाषा के अलावा, उस प्रदेश में अनेक स्थानीय बोलियाँ प्रचलित हैं, जिनमें ब्रज, अवधी, कौरवी, बुन्देली, बघेली, भोजपुरी, राजस्थानी आदि शामिल हैं।
- केंद्रीय साहित्यिक भाषा के रूप में किसी बोली का स्वीकृत होना राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक आदि अनेक कारणों से घटित होता है।
- हिंदी साहित्य के इतिहास में खड़ी बोली के अलावा ब्रज, अवधी और अन्य बोलियों का साहित्य भी यथोचित रूप से सम्मिलित है।
- हिंदी शब्द का प्रयोग भाषा के नाम के अलावा जाति, प्रदेश और संस्कृति के विशेषण की तरह भी होता आया है।
अपभ्रंश: पुरानी हिंदी
- सामान्यतः संवत 1050 को हिंदी साहित्य के आरम्भ के रूप में स्वीकार किया जाता है।
- हिंदी साहित्य की पृष्ठभूमि के अध्ययन के लिए 700-1000 ईस्वी तक का कालखण्ड महत्त्वपूर्ण है, जब पुरानी हिंदी अथवा 'अपभ्रंश' ने विविध साहित्यरूपों में विकसित होकर साहित्यभाषा का स्थान पाया।
- आधुनिक आर्यभाषाओं में प्राकृतों के रूपान्तर की कड़ी बनी।
व्याकरण
- अपभ्रंश के संबंध में प्राचीन अलंकारग्रंथों में दो प्रकार के विरोधी मत मिलते हैं।
- नमिसाधु अपभ्रंश को प्राकृत कहते हैं, जबकि भामह आदि आचार्य इसे प्राकृत से भिन्न मानते हैं।
- अपभ्रंश के शब्दकोश का अधिकांश प्राकृत से लिया गया है, लेकिन व्याकरणिक गठन आधुनिक भाषाओं के निकट है।
- अपभ्रंश में संस्कृत और प्राकृत के संज्ञारूपों से विभक्ति-प्रत्यय अलग होते हैं।
- विशुद्ध भाषाशास्त्रीय दृष्टि से अपभ्रंश को पालि और प्राकृत के बाद माना गया है, जिससे आधुनिक आर्यभाषाओं का विकास हुआ।
- अपभ्रंश नाम संस्कृत आचार्यों का दिया हुआ है और इसके कवियों ने अपनी भाषा को ‘भासा’ कहा है।
- अपभ्रंश के रूप और प्रयोग प्रथम शतक से निश्चित प्रचलन में आ चुके थे और वररुचि के प्राकृत-प्रकाश में वर्णित साहित्यिक प्राकृत से प्राचीनतर हैं।
- यह मानना गलत है कि अपभ्रंश का जन्म भी इन्हीं तीन सौ वर्षों में हुआ था
- आधुनिक भाषाओं में संस्कृत शब्दों का पुनरागमन हुआ, जबकि अपभ्रंश में वे लगभग अनुपस्थित हो चुके थे।
भाषा में केंद्रीय और मानक रूप का धारण
- कालान्तर में केंद्रीय और मानक भाषा बनने वाली परिनिष्ठित साहित्यिक भाषा स्थिर होकर लोकसामान्य की समझ से बाहर हो जाती है।
- जीवन्त लोकभाषा का स्वरूप निरन्तर गतिशील रहता है और राजनीतिक-आर्थिक कारणों से केंद्रीय भाषा के आसन पर कोई और बोली बैठ जाती है।
- प्राकृतों की संख्या चार बताई गई है: महाराष्ट्री, शौरसेनी, पैशाची और मागधी, जिनमें महाराष्ट्री को मूल प्राकृत माना गया है।
- शौरसेनी पश्चिमी हिन्दी है और मागधी बिहार और बंगाल की भाषाओं का पूर्व रूप है।
- अपभ्रंश और आभीरजन: अपभ्रंश को आभीरजन की भाषा माना गया और आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने भरत मुनि के नाट्यशास्त्र का उल्लेख किया है।
संस्कृत में आभीर- अहीर
- संस्कृत शब्द आभीर का प्राकृत भाषा में अहीर हो जाता है।
- वे यदुवंशी, ग्वालवंशी और गोपालों के साथ अभिन्न माने गए हैं।
- आभीरों के हाथ में राजसत्ता आने पर अपभ्रंश को साहित्यिक भाषा के रूप में समादर प्राप्त हुआ।
- आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार, नवीं शताब्दी में अपभ्रंश सौराष्ट्र से मगध तक फैल चुकी थी और लोकभाषा बन गई थी।
- हेमचन्द्राचार्य ने अपने शब्दानुशासन में अपभ्रंश का व्याकरण भी सम्मिलित किया।
- हेमचन्द्राचार्य का व्याकरण एक ही अपभ्रंश की चर्चा करता है, क्योंकि व्याकरण में बँधने लायक भाषा एक सुस्थिर मानक रूप ले चुकी थी।
- आधुनिक भाषाओं के पूर्व रूप अनेक प्राकृत भाषाएँ इन रूपान्तरों से गुजरी होंगी और अनेक अपभ्रंशों का अस्तित्व रहा होगा।
अपभ्रंश का साहित्य
- अपभ्रंश के साहित्य को भाषाकाव्य कहने का चलन था, लेकिन इसका वस्तुतः प्राप्त साहित्य बहुत ज्यादा नहीं है।
- बाद में पता चला कि जिन पुस्तकों को प्राकृत की रचना समझा जाता था, उनमें से बहुत अपभ्रंश की थीं।
- जैन ग्रन्थ: जैन भण्डारों में अनेक अपभ्रंश पुस्तकें मिलीं, जो जैन धर्मावलम्बियों द्वारा जैनधर्मी सिद्धान्तों के विषय में लिखित थीं।
- इन कवियों में स्वयम्भू, पुष्पदन्त, धनपाल, जोइन्दु, मुनि रामसिंह के नाम प्रमुख हैं।
- आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अनेक जैन रचनाओं के नाम गिनाए हैं और हेमचन्द्र भी जैन आचार्य थे।
- इतर स्रोतों से प्राप्त अपभ्रंश रचनाएँ: प्राकृतपैंगलम् में अपभ्रंश कविताएँ और अब्दुलरहमान का संदेशरासक विरहकाव्य है। बौद्ध गान ओ दोहाकोश में संकलित दोहा की भाषा में पूर्वी भाषा के चिह्नों के कारण उसे बाँगला, मैथिली, मगही, भोजपुरी, ओड़िया का भी पूर्वरूप माना गया।
संधा भाषा अथवा उलटबाँसियाँ
- उलटबाँसी शैली शैव नाथपन्थियों की शैली के समान है और उलटबाँसी की परम्परा हिन्दी में निर्गुण सन्तों तक चलती रही
- निष्कर्ष: और पूर्वी सिरे पर मागधी हिन्दी की पूर्ववर्ती प्राकृतें रही हैं।
- ये दोनों हिन्दी साहित्य के दो भिन्न भाषिक मूल हैं और इन दोनों प्रकार के साहित्य में दो भिन्न आर्यजातियों के रचे हुए साहित्य के संस्कार हैं
- पश्चिमी अपभ्रंश से चारण काव्य की राजस्तुति और पूर्वी अपभ्रंश से निरगुनियाँ सन्तों की विचारधारा आई।
- आधुनिक भाषाओं में संस्कृत शब्दों का पुनरागमन हुआ।
- हिंदी साहित्य के आदिकाल में विषयवस्तु और संवेदना के साथ अपभ्रंश का भाषागत उत्तराधिकार भी पाया गया, जो आगे चलकर हिंदी भाषी प्रदेश की अनेक बोलियों में विकसित हुआ।
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