तोयवर्गः (Types of Water)

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Questions and Answers

आयुर्वेद के अनुसार, गंगाजल का निम्नलिखित में से कौन सा गुण नहीं है?

  • भारी (correct)
  • बुद्धि को बढ़ाना
  • हृदय के लिए हितकर
  • अमृत के समान

चरक संहिता के अनुसार, 'मृष्टं' का अर्थ क्या है, जबकि 'मृजू शुद्धौ' धातु से 'क्त' प्रत्यय का योग हो?

  • स्वादु
  • विमल
  • शीतल
  • शुद्ध (correct)

गंगाजल की शुद्धता की पहचान क्या है?

  • चांदी के बर्तन में रखे चावल का वर्ण अविकृत रहे (correct)
  • चांदी के बर्तन में रखे चावल क्लेदयुक्त हो जाए
  • चांदी के बर्तन में रखे चावल में सड़न हो जाए
  • चांदी के बर्तन में रखे चावल का रंग बदल जाए

किस महीने में सामुद्र जल पीने योग्य माना जाता है?

<p>आश्विन (A)</p> Signup and view all the answers

विवेकशील विद्वान 'ऐन्द्र' जल किसे कहते हैं?

<p>आकाश से गिरने वाला जल (C)</p> Signup and view all the answers

निम्नलिखित में से कौन सा जल पीने योग्य नहीं माना जाता है?

<p>कीचड़ और सिवार से युक्त जल (D)</p> Signup and view all the answers

किस ऋतु में आन्तरिक्ष और औद्भिद जल को पीने की सलाह दी जाती है?

<p>वर्षा ऋतु (C)</p> Signup and view all the answers

अगस्त्य उदय के बाद किस ऋतु में सभी प्रकार के जल स्वच्छ हो जाते हैं?

<p>शरद ऋतु (C)</p> Signup and view all the answers

ब्रह्मसरोवर तथा अन्य तालाबों के जल किस ऋतु में पीने योग्य नही होते ?

<p>प्रावृट् (B)</p> Signup and view all the answers

निम्नलिखित में से कौन सा जल आठ प्रकार के जलों में सम्मिलित नहीं है?

<p>समुद्र जल (B)</p> Signup and view all the answers

पश्चिम की ओर बहने वाली नदियों के जल के बारे में क्या सत्य है?

<p>वे हितकारक और निर्मल होते हैं (D)</p> Signup and view all the answers

हिमालय से निकलने वाली नदियाँ, पत्थरों से टकराकर छिन्न-भिन्न होने के बाद किस रोग का कारण नहीं बनती?

<p>नेत्ररोग (A)</p> Signup and view all the answers

प्राच्यदेश (आसाम तथा बंगाल) की नदियाँ निम्नलिखित में से किस रोग को उत्पन्न करती हैं?

<p>अर्श (बवासीर) (A)</p> Signup and view all the answers

पर्वतीय प्रदेश में कुएँ और तालाब का जल कैसा होता है?

<p>ऊपरी भाग में हितकर, निचले भाग में हानिकारक (A)</p> Signup and view all the answers

मलिन जल को शुद्ध करने के लिए सुश्रुत के अनुसार कितने पदार्थ उपयोग में लाए जाते हैं?

<p>सात (B)</p> Signup and view all the answers

शरीर को 'सम' रखने के लिए भोजन करते समय कैसा जलपान करना चाहिए?

<p>बीच-बीच में जल पीना (A)</p> Signup and view all the answers

शीतल जलपान से निम्नलिखित में से क्या नहीं होता है?

<p>वजन बढ़ना (C)</p> Signup and view all the answers

उष्ण जलसेवन से निम्नलिखित में से कौन-सा लाभ होता है?

<p>बस्ति का शोधन (D)</p> Signup and view all the answers

पकाकर शीतल किया हुआ जल किस दोष में हितकर होता है?

<p>पित्त दोष (B)</p> Signup and view all the answers

नारियल का जल निम्नलिखित में से किसे नष्ट नहीं करता है?

<p>वात रोग (C)</p> Signup and view all the answers

सामान्य दूध (गाय का दूध) का निम्नलिखित में से कौन सा गुण नहीं है?

<p>अग्निदीपक (D)</p> Signup and view all the answers

गाय के दूध का विशेष गुण क्या है?

<p>जीवनीय शक्ति देना (A)</p> Signup and view all the answers

भैंस के दूध का गुण किसके लिए हितकर है?

<p>जिनकी जठराग्नि तीक्ष्ण हो (A)</p> Signup and view all the answers

बकरी के दूध का गुण क्या है?

<p>शोष, ज्वर और श्वास रोगों को नष्ट करना (A)</p> Signup and view all the answers

ऊँटनी के दूध का गुण क्या है?

<p>कफ और कृमिरोगों को नष्ट करना (A)</p> Signup and view all the answers

किसके दूध का उपयोग नेत्र रोगों में तर्पण और आश्च्योतन के लिए किया जाता है?

<p>नारी (B)</p> Signup and view all the answers

भेड़ी के दूध का कौन सा गुण है?

<p>वातव्याधिनाशक (A)</p> Signup and view all the answers

एकशफ प्राणियों के दूध का क्या गुण है?

<p>वातदोष को शांत करना (D)</p> Signup and view all the answers

कच्चा दूध कैसा होता है?

<p>अभिष्यन्दी और गुरु (C)</p> Signup and view all the answers

दही का मुख्य गुण क्या है?

<p>अम्ल और वातनाशक (B)</p> Signup and view all the answers

किस ऋतु में दही नहीं खाना चाहिए?

<p>वसंत (C)</p> Signup and view all the answers

मट्ठा (छाछ) का मुख्य गुण क्या है?

<p>कषाय, अम्ल व कफ-वात नाशक (C)</p> Signup and view all the answers

नया मक्खन (नवनीत) कैसा होता है?

<p>वीर्यवर्धक और शीतल (C)</p> Signup and view all the answers

पुराना घी निम्नलिखित में से किस रोग को ठीक करने में मदद करता है?

<p>रक्तपित्त (B)</p> Signup and view all the answers

सबसे अच्छा घी कौन सा माना जाता है?

<p>गाय का घी (C)</p> Signup and view all the answers

ईख (गन्ना) के रस का सामान्य गुण क्या है?

<p>स्निग्ध (B)</p> Signup and view all the answers

पौण्ड्रक ', गन्ने की एक किस्म, का गुण क्या है?

<p>शीतल और स्वच्छ (D)</p> Signup and view all the answers

फाणित (राब) का क्या गुण है?

<p>गुरु और अभिष्यन्दी (A)</p> Signup and view all the answers

पुराना गुड़ कैसा होता है?

<p>ह्रदय के लिए हितकर (C)</p> Signup and view all the answers

शर्कराओं (चीनी) का मुख्य गुण क्या है?

<p>दाह और तृष्णा शामक (B)</p> Signup and view all the answers

शहद (मधु) का मुख्य गुण क्या है?

<p>नेत्रों के लिए हितकर (C)</p> Signup and view all the answers

Flashcards

गंगाजल कैसा होता है?

गंगा का जल जीवनदायक, तृप्तिकारक, हृदय के लिए अच्छा, आनंददायक, और बुद्धि बढ़ाने वाला होता है।

गंगाजल की पहचान क्या है?

जिस जल के बरसते समय घर के अंदर चाँदी के पात्र में रखा शालिचावलों का भात निर्मल रहे, और पसीजे नहीं, वह गंगाजल होता है।

समुद्र का जल कब पीने योग्य होता है?

समुद्र का जल पीने योग्य नहीं होता, सिवाय आश्विन महीने के।

पानीय जल किसे कहते हैं?

बादलों से बरसा हुआ जल जो साफ़ पात्र में रखा हो और विकारयुक्त न हो, हमेशा पीना चाहिए।

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कौन सा जल नहीं पीना चाहिए?

कीचड़, सिवार, तिनके, या पत्तों से दूषित जल नहीं पीना चाहिए।

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जल का निर्णय कैसे होता है?

कुएँ, तालाब, और झील के पानी का निर्णय जांगल, अनूप और पर्वतीय देश के अनुसार होता है।

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गंगाजल कब बरसता है?

गंगाजल प्राय: आश्विन मास में बरसता है।

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शीतल जल पीने के क्या लाभ हैं?

शीतल जल मदात्यय, ग्लानि, मूर्च्छा, वमन, श्रम, भ्रम, तृष्णा, दाह, पित्तविकार, रक्तविकार और विषविकार को दूर करता है।

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उष्ण जल पीने के क्या लाभ हैं?

उष्ण जल जठराग्नि को बढ़ाता है, आमरस को पचाता है, कण्ठ के लिए हितकर है, और बस्ति को साफ़ करता है।

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उष्ण जल किन रोगों में फायदेमंद है?

उष्ण जल हिक्का, अफरा, वातविकार, कफविकार, नवज्वर, कास, आमाजीर्ण, पीनस, श्वास, और पार्श्वशूल रोगों में प्रशस्त है।

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नारियल पानी कैसा होता है?

नारियल का जल स्निग्ध, स्वादु, वीर्यवर्धक, शीतल, और लघु होता है।

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नारियल पानी के क्या फायदे हैं?

नारियल का जल प्यास, पित्तविकार, वातविकार को नष्ट करता है, अग्नि को प्रदीप्त करता है और बस्ति को शुद्ध करता है।

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गाय के दूध के क्या गुण हैं?

गाय का दूध जीवनीय शक्ति देने वाला और रसायन के गुणधर्मों से युक्त होता है।

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गाय का दूध और क्या करता है?

गाय का दूध मेधादायक, बलकारक, कुचवर्धक तथा सर है।

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गाय का दूध किन रोगों का नाश करता है?

गाय का दूध श्रम, भ्रम, मद, अलक्ष्मी, श्वास, कास, प्यास, अधिक काँपना, अधिक भूख लगना, जीर्ण ज्वर, मूत्रकृच्छ्र तथा रक्तपित्त रोग का विनाशक है।

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भैंस का दूध किसके लिए अच्छा है?

भैंस का दूध जिनकी तेज़ जठराग्नि है, और जिसे नींद न आती हो उनके लिए हितकर होता है।

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भैंस का दूध गाय के दूध से कैसे अलग है?

भैंस का दूध गाय के दूध से अधिक गुरु तथा शीतल होता है।

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बकरी का दूध किन रोगों को ठीक करता है?

बकरी का दूध शोष, ज्वर, श्वास, रक्तपित्त तथा अतिसार रोगों को नष्ट करता है।

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ऊँटनी का दूध किन रोगों में हितकर है?

ऊँटनी का दूध वातविकार, कफविकार, आनाह, कृमिरोग, शोथरोग, उदररोग तथा अर्शोरोग में हितकर है।

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नारी का दूध नेत्ररोगों में कैसे काम आता है?

नारी का दूध वात, पित्त, रक्त तथा अभिघात के कारण उत्पन्न नेत्र सम्बन्धी रोगों में हितकर होता है, यदि तर्पण, आश्च्योतन एवं नस्य के रूप में प्रयोग करें।

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भेड़ी का दूध कैसा होता है?

भेड़ी का दूध हृदय को अप्रिय या अहितकर, उष्ण, वातव्याधिनाशक, हिचकी, श्वास, पित्त एवं कफ को बढ़ाता है।

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हथिनी के दूध का क्या गुण है?

हथिनी का दूध शरीर की स्थिरता को पर्याप्त मात्रा में बढ़ाता है।

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एकशफ दूध किस दोष का नाश करता है?

एक खुर वाले प्राणियों (घोड़ी, गधी आदि) का दूध शाखाओं के वातदोष का नाशक है।

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कच्चा दूध कैसा होता है?

कच्चा दूध अभिष्यन्दी एवं गुरु, और पाक में भारी होता है।

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पका हुआ दूध कैसा होता है?

विधिवत् पकाया गया दूध, कच्चे दूध के विपरीत गुण वाला होता है।

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धारोष्ण दूध कैसा होता है?

अत्यन्त पकाया गया दूध अधिक गुरु हो जाता है और धारोष्ण दूध अमृत के समान गुणकारक होता है।

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दही कैसा होता है?

दही पाक एवं रस में अम्ल होता है।

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दही के गुण क्या हैं?

दही ग्राही, गुरु, उष्ण, और वातनाशक होता है।

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तक्र कैसा होता है?

तक्र लघु, कषाय, अम्ल, जठराग्निदीपक तथा कफ-वातनाशक होता है।

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मक्खन कैसा होता है?

नवनीत (ताजा मक्खन) वीर्यवर्धक, शीतल, कान्तिकारक, बलवर्धक, अग्नि को तीव्र करने वाला और संग्राही होता है।

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घृत के क्या गुण हैं?

पुराने घी में बुद्धि, स्मृति, मेधा, जठराग्नि, शारीरिक बल, दीर्घायु, शुक्र तथा दृष्टि के लिए उत्तम गुण होते है।

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ईख के रस का वर्णन?

ईख का रस गुरु, स्निग्ध, बृंहण, कफ तथा मूत्र को बढ़ाने वाला होता है।

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ईख के रस के विभिन्न भाग?

अगले भाग का रस कुछ नमकीन जैसा होता है और मध्य भाग का दाँतों से चूसा हुआ रस चीनी के समान मधुर एवं गुणकारक होता है।

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फ़ाणित के गुण?

फ़ाणित गुरु, अभिष्यन्दी, दोषों का संचय करने वाला किन्तु मूत्र का शोधन करने वाला होता है।

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मधु का वर्णन?

मधु (शहद) नेत्रों के लिए हितकारक होता है, कफ को निकाल देता है; प्यास, कफदोष, विषविकार, हिक्का (हिचकी), रक्तपित्त, प्रमेह, कुष्ठ, क्रिमि, छर्दि, श्वास, कास तथा अतिसार रोग को नष्ट करता है

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अलगाव में

तिल का अपने सामान गुणवाला और दोषनाशक होता है

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अलगाव में

सरसों का तेल कटु होने के साथ कफ का नाश होता है

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Study Notes

  • जीवनं तर्पणं हृद्यं ह्लादि बुद्धिप्रबोधनम्। तन्वव्यक्तरसं मृष्टं शीतं लघ्वमृतोपमम् ।। १॥ गङ्गाम्बु नभसो भ्रष्टं स्पृष्टं त्वर्केन्दुमारुतैः । हिताहितत्वे तद्भ्यो देशकालावपेक्षते ।। २ ।।

तोयवर्गः (Types of Water)

  • गंगा का जल जीवित रखने वाला, तृप्तिकारक, हृदय के लिए हितकर, आनंददायक, और बुद्धि को बढ़ाने वाला होता है।
  • गंगा का जल पतला, गन्दगी रहित, अव्यक्त रस (मधुर आदि किसी रस-विशेष की जिसमें अभिव्यक्ति न हो), मृष्ट, शीतल, हलका और अमृत के समान हितकर होता है।
  • यह जल आकाश से गिरने के बाद सूर्य, चन्द्र तथा वायु के स्पर्श से देश एवं काल के प्रभाव से हितकर भी हो सकता है और अहितकर भी हो सकता है।
  • गंगाजल का परिचय - जिस जल के बरसते समय घर के भीतर चाँदी के पात्र में परोसा हुआ शालिचावलों का भात निर्मल बना रहे, वह क्लेदयुक्त न हो अर्थात् पसीजने न लगे और उसका वर्ण विकारयुक्त न हो जाय, वह गंगा का जल होता है, इसे पीना चाहिए।
  • सामुद्र जल उक्त गंगाजल के विपरीत होता है, उसे समुद्र का जल कहते हैं और वह पीने के योग्य नहीं होता है।
  • समुद्र का जल आश्विन मास में पीने योग्य हो जाता है।
  • चरक के अनुसार आकाश से मेघ की सहायता से बरसने वाले सभी जल एक समान होते हैं।
  • प्रधान जल वह है जो जल इन्द्र (मेघ) द्वारा उत्पन्न हुआ आकाश से गिरता है और स्वच्छ पात्रों में संग्रह कर लिया जाता है, उसे ही विवेकशील विद्वान् 'ऐन्द्र' जल कहते हैं।
  • वही जल राजाओं अथवा श्रीमानों के पीने योग्य होता है और यह जल प्रायः आश्विन मास में ग्रहण किया जाता है।
  • जल दो प्रकार का होता है- १. गंगा का जल और २. समुद्र का जल, इनमें गंगा का जल प्रायः आश्विन मास में बरसता है और उक्त दोनों प्रकार के जलों की परीक्षा करनी चाहिए।
  • जिस समय पानी बरस रहा हो, उस समय पकाये हुए चावलों के न गले हुए अविवर्ण (जिसका स्वाभाविक वर्ण विकृत न हुआ हो) एक पिण्ड को चाँदी की थाली में रख दें।
  • यदि ४-५ घण्टे में भी वह पिण्ड उसी प्रकार अविकृत रहता है, तो समझें इस समय गंगा का जल बरस रहा है।
  • यदि उस भात के पिण्ड का रंग बदल जाय, उसमें कुछ सड़न के लक्षण दिखलायी दें, कुछ गदलापन दिखलायी दे तो समझना चाहिए कि इस समय सामुद्र जल बरस रहा है।
  • सामुद्र जल को आश्विन मास में ग्रहण किया जा सकता है।
  • समुद्री जल को ही सामुद्र जल कहते हैं।
  • मानसून द्वारा उठे हुए बादलों से जो जल बरसता है, उसे समुद्र का जल कहा जाता है।
  • गंगाजल जितनी भी तेज बहने वाली नदियाँ हैं, उन सबका नाम गंगा है और क्योंकि गंगा उसे कहते हैं जिसमें निरन्तर प्रवाह (बहाव ) हो।
  • वेगवती नदियों का जल शुद्ध होता है और देखें 'नदी वेगेन शुध्यति' । (चा.नी. ६।३) अतः जल की परीक्षा करके उसका संग्रह तथा प्रयोग करें।
  • कभी आश्विन में भी सामुद्र जल बरस सकता है और यद्यपि शरद् ऋतु का जल वर्षा ऋतु के जल से अवश्य स्वच्छ होता है, तथापि परीक्षा कर लेनी चाहिए।
  • गंगा का जल पीने योग्य ( हितकर) होता है और समुद्र का जल पीने योग्य नहीं होता, भले ही वह नमकीन न हो।
  • आश्विन मास से ज्येष्ठ मास तक जो वर्षा का जल होता है, वह पानीय (पीने योग्य) होता है, शेष महीनों में बरसने वाला जल सामान्यतः अपेय होता है।
  • ऐन्द्रम् अम्बु (बादलों से बरसा हुआ जल) जो साफ-सुथरे पात्र में रखा हो और जो किसी प्रकार से विकार युक्त न हुआ हो, उसे सदा पीना चाहिए।
  • इसके अभाव में उस प्रकार के जल को पीना चाहिए, जो आकाश से बरसे हुए जल की भाँति स्वच्छ हो तथा पृथिवी के स्वच्छ, पवित्र तथा काले अथवा सफेद स्थान (पात्र) में रखा गया हो, जिसमें सूर्य की किरणों एवं शुद्ध हवा का स्पर्श होता हो; इस दृष्टि से तालाब तथा झील के जल पीने के योग्य होते हैं।
  • कीचड़, सिवार, तिनके तथा पत्तों के फैल जाने के कारण जो जल मलिन हो गया हो, उसे नहीं पीना चाहिए।
  • जिस जल पर सूर्य-चन्द्रमा की किरणों का तथा शुद्ध वायु का स्पर्श न होता हो, जो अभी-अभी बरसा हो अर्थात् जो पहली वर्षा का जल हो, जो जल घन (गदला) होने के कारण गुरु (पचने में भारी) हो, जिसके ऊपर झाग उठी हो, जो क्रिमियुक्त हो, स्पर्श में उष्ण हो तथा जो अत्यन्त शीतल होने के कारण दाँतों में लगकर पीड़ा उत्पन्न करता हो, उस जल को नहीं पीना चाहिए।
  • वर्षाऋतु के जल को आर्तवजल कहते हैं, इस काल के अतिरिक्त जब भी तत्काल जल बरसे, उसे अनार्तव' जल कहते हैं और जो वर्षाकाल में भी आकाश से पहली बार बरसा हुआ जल है, उसे भी न पीयें।
  • लूता आदि प्राणियों की जो लार से, मल-मूत्र तथा विष के सम्पर्क से दूषित जल हो, उसे भी नहीं पीना चाहिए।
  • वर्षा ऋतु में आन्तरिक्ष (आकाश से प्राप्त), औद्भिद (स्रोत से निकलने वाले) जल को पीना चाहिए।
  • भाद्रपद में जल को गरम करके ठण्डा कर लें, तब पीयें क्योंकि ये दोनों प्रकार के जल महागुण वाले होते हैं।
  • शरद् ऋतु में सभी प्रकार के जलों का सेवन किया जा सकता है, क्योंकि इन दिनों अगस्त्य का उदय हो जाता है।
  • हेमन्त ऋतु में सरोवर तथा तालाबों का जल पीने योग्य हो जाता है और वसन्त तथा ग्रीष्म ऋतु में कुआँ तथा झरने का जल पीना चाहिए।
  • प्रावृट् ऋतु में सरोवर, तालाब एवं कुआँ का जल नहीं पीना चाहिए और शेष जल पेय होते हैं, निषेध केवल "अभिवृष्ट' जल का है और ऐसे जल में स्नान भी नहीं करना चाहिए।
  • वर्षा के साथ भूमि पर गिरने वाले कीड़े आदि के विष के कारण उस समय का जल त्याज्य है।
  • वर्षा के जल से स्नान करने से खुजली जैसे रोग और पीने से कास, प्रतिश्याय हो सकता है।
  • आठ प्रकार के जल १. कौप (कुएँ का जल), २. सारस (सरोवर या झील का जल), ३. ताडाग (तालाब का जल), ४. चौण्डय ५. प्राम्रवण (झरना का जल ), ६. औद्भिद (चश्मा या स्रोत का जल), ७. वाप्य (बावड़ी का जल) तथा ८. नदी का जल।
  • पश्चिमी समुद्र की ओर बहने वाली, वेग से बहने वाली तथा निर्मल जल वाली नदियाँ हितकारक जल वाली होती हैं और इन गुणों के विपरीत जो नदियाँ हैं, उनका जल अहितकारक होता है।
  • हिमालय तथा मलय पर्वत से निकल कर बहने वाली नदियाँ जिनका जल पत्थरों तथा चट्टानों से टकराकर गिरने से छिन्न-भिन्न होने के कारण खिन्न (दुःखी, आलोड़ित ) हो जाता है, उनका जल पथ्य ( हितकर ) होता है।
  • प्राच्यदेश (आसाम तथा बंगाल) की, आवन्त्य देश (मालव) की तथा अपरान्त सह्याद्रि का पश्चिमी प्रदेश- कोंकण प्रदेश की नदियाँ अर्श (बवासीर), उदररोग तथा श्लीपद (फीलपाँव) रोगों को पैदा करती हैं।
  • सह्याचल तथा विन्ध्याचल की नदियाँ कुष्ठरोग, पाण्डुरोग एवं शिरोरोगों को उत्पन्न कर देती हैं और पारियात्र पर्वत से उत्पन्न नदियों का जल दोषनाशक होता है।
  • इसका सेवन करने से बल एवं पौरुष (उत्साहशक्ति) की वृद्धि होती है तथा समुद्र का जल तीनों दोषों को उभाड़ने वाला होता है।
  • पश्चिम समुद्र की ओर बहने वाली नदियों का जल हितकर होता है, क्योंकि उनका जल हलका होता है।
  • पूर्वी समुद्र की ओर बहने वाली नदियों का जल हितकर नहीं होता, क्योंकि इनका जल भारी होता है।
  • दक्षिण समुद्र की ओर बहने वाली नदियों का जल अधिक दोषकारक नहीं होता, क्योंकि यह जल साधारण होता है।
  • पश्चिमाभिमुखी नदियाँ - शतद्रु (सतलज) तथा विपाशा (व्यास) आदि है।
  • पूर्वाभिमुखी नदियाँ - गंगा (समतल भाग में बहने वाली), यमुना, सरयू आदि।
  • दक्षिणाभिमुखी नदियाँ-नर्मदा, ताप्ती, पयोष्णी, गोदावरी, कावेरी आदि। जिन नदियों का जल उत्तम कहा गया है, उनकी उत्तमता का मापदण्ड है- उनकी प्रवाहशीलता; अन्यथा प्रवाह के शिथिल होने पर उत्तमता में भी शिथिलता आ जाती है, फलतः वे भी अपथ्यकारक हो जाती हैं।
  • कूप आदि का जल कुआँ, तालाब, झील आदि के जलों के गुण-दोष का निर्णय जांगल देश, अनूपदेश तथा पर्वतीय देश के अनुसार होता है।
  • जांगल देश के कुएँ, तालाब आदि का जल स्वास्थ्य-वृद्धि के लिए उत्तम होता है, अनूपदेश में स्थित इनका जल हानिकारक तथा पर्वतीय प्रदेश का जल ऊपरी भागों में हितकर एवं पर्वत के निचले भाग का जल प्रायः अहितकर होता है।
  • मलिन जल को शुद्ध करने वाले सात पदार्थ हैं- १. कतक (निर्मली), २. गोमेदक, ३. विसग्रन्थि (कमल की जड़), ४. शैवाल (काई) की जड़, ५. वस्त्र, ६. मोती, ७. मणि (फिटकिरी) आदि।
  • पाँच वस्तुएँ ऐसी होती हैं, जिनके ऊपर पानी के पात्र को रख देने से भूमि का प्रभाव जल पर नहीं पड़ता - १. फलक २. त्र्यष्टक ३. मुञ्जवलय ४. उदकमञ्चिका तथा ५. शिक्य ।
  • पानी को शीतल करने के सात उपाय हैं- १. हवा में (बुले स्थान में) पानी को रखना, २. पानी से भरे पात्र को बाहर से गीले वस्त्र से लपेट कर उसे तर रखना, ३. यन्त्र, लकड़ी आदि को घुमाते रहना, ४. पंखा चलाना, ५. वस्त्र द्वारा छानना, ६. पानी भरे पात्र को बालू के आसन पर रखना तथा ७. जलपात्र को छींके पर लटकाना।
  • शक्ति से अधिक जल किसी को नहीं पीना चाहिए।
  • मन्दाग्नि, गुल्म, पाण्डुरोग, उदररोग, अतिसार, अर्शोरोग, ग्रहणीरोग, शोष (राजयक्ष्मा ) तथा शोथरोग से युक्त पुरुषों को थोड़ा जल पीना चाहिए।
  • भोजन करते समय बीच-बीच में पानी पीने वालों का शरीर 'सम' रहता है और भोजन के अन्त में जल पीने वालों का शरीर स्थूल (मोटा) होता है और भोजन के आरम्भ में जल बोने वालों का शरीर कृश (दुर्बल) हो जाता है।
  • शीतल जल का सेवन करने से मदात्ययरोग, ग्लानि (हर्षक्षय), मूर्च्छा (बेहोशी), छर्दि (वमन), श्रम (थकावट), भ्रम, तृष्णा, उष्ण या ऊष्म (गर्मी या पसीने की अधिकता ), दाह (जलन), पित्तविकार, रक्तविकार तथा विषविकार नष्ट हो जाते हैं।
  • उष्ण जल सेवन जठराग्नि को प्रदीप्त करता है, आमरस को पचाता है, कण्ठ के लिए हितकर है, लघु (शीघ्र पचता) है, बस्ति का शोधक है; हिक्का, अफरा, वातविकार, कफविकार, तत्काल किये गये वमन, विरेचन, नवज्वर, कास, आमाजीर्ण, पीनस, श्वास तथा पार्श्वशूल रोगों में इसका प्रयोग प्रशंसित है।
  • उष्ण जल के प्रयोग सम्बन्धी अनेक स्वरूप देखने को मिलते हैं। यथा- १. अष्टमांश शेष, २. चतुर्थांश शेष, ३. अर्धांश शेष तथा ४. उबाल कर रखा गया और ये जल उत्तरोत्तर सामान्य होते हैं।
  • अष्टमांश शेष जल का प्रयोग प्रायः उच्च तापमान वाले ज्वर में गुनगुना करके दिया जाता है।
  • श्रृतशीत एवं बासी जल उक्त विधियों से पकाकर शीतल किया हुआ जल अभिष्यन्दी नहीं होता अपितु वह लघु होता है और यह जल वातपित्त, कफपित्त तथा सन्निपात में भी यदि पित्त की अधिकता हो तो हितकर होता है और यही जल जब बासी हो जाता है, तो त्रिदोषकारक होता है।
  • नारियल का जल-नारियल के कच्चे फल के भीतर दूध की आकृति का जो पानी होता है, वह स्निग्ध, स्वादु, वृष्य (वीर्यवर्धक), शीतल तथा लघु होता है।
  • यह प्यास, पित्तविकार, वातविकार को नष्ट करता है, अग्नि को प्रदीप्त करता है तथा बस्ति को शुद्ध करता है।
  • वर्षा ऋतु में दिव्य (वर्षा का) जल उत्तम होता है और नदी का जल पीने योग्य नहीं होता है।

क्षीरवर्गः(Types of Milk)

  • सामान्य दूध के गुण प्रायः दूध रस एवं पाक में मधुर, स्निग्ध, ओजस् एवं रस आदि धातुओं को बढ़ाने वाला, वात-पित्तशामक, वीर्यवर्धक, कफकारक, गुरु तथा शीतल होता है।
  • गाय के दूध जीवनीय शक्ति को देने वाला तथा रसायन के गुण-धर्मों से युक्त होता है और उरःक्षत एवं क्षयरोगियों के लिए हितकर होता है।
  • गाय का दूध मेधा ( धारणाशक्ति) दायक, बलकारक, कुचवर्धक तथा सर है। यह श्रम, भ्रम, मद, अलक्ष्मी (कान्तिहीनता), श्वास, कास, प्यास का अधिक काना, अधिक भूख का लगना, जीर्ण (पुराना) ज्वर, मूत्रकृच्छ्र तथा रक्तपित्त रोग का विनाशक है।
  • भैंस के दूध का गुण जिनकी जठराग्नि तीक्ष्ण हो गयी हों, जिन्हें नींद न आती हों उनके लिए हितकर होता है और यह गाय के दूध से अधिक गुरु तथा शीतल होता है।
  • बकरी के दूध के गुण बकरी जल थोड़ा पीती है, कूदना फाँदना, दौड़ना आदि अनेक प्रकार का व्यायाम अधिक करती है; कटु-तिक्त रस युक्त पत्तों को प्रायः खाती रहती है, अतः उसका दूध हलका (सुपच) होता है।
  • बकरी का दूध शोष (राजयक्ष्मा), ज्वर, श्वास, रक्तपित्त तथा अतिसार रोगों को नष्ट करता है।
  • ऊँटनी के दूध के गुण ऊँटनी का दूध थोड़ा रूक्षता युक्त, उष्ण तथा लवण रसयुक्त, अग्निदीपक, लघु (हलका) होता है।
  • यह वातविकार, कफविकार, आनाह (अफरा), कृमिरोग, शोथरोग, उदररोग तथा अर्शोरोग में हितकर होता है।
  • नारी का दूध वात, पित्त, रक्त तथा अभिघात (चोट आदि लगने) के कारण उत्पन्न नेत्र सम्बन्धी रोगों में तर्पण, आश्च्योतन एवं नस्य के रूप में प्रयोग करने से हितकर होता है।
  • भेड़ी के दूध का गुण हृदय को अप्रिय या अहितकर, उष्ण, वातव्याधिनाशक, हिचकी, श्वास, पित्त एवं कफ को उभाड़ता है।

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